भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 696
६८६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| किञ्चान्यत् “ब्रह्मा विश्वसृजो<br>सकामानां नित्य- धर्मो महानव्यक्त-<br>कर्मणां फलम् मेव च । उत्तमां<br>सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनी-<br>षिणः” इति च देवसार्ष्टिव्यति-<br>रेकेण भूताप्ययं दर्शयति “भूता-<br>न्यप्येति पञ्च वै”। भूतान्यत्ये-<br>तीति पाठं ये कुर्वन्ति, तेषां वेद-<br>विषये परिच्छिन्नबुद्धित्वाददोषः। | इसके सिवा दूसरी बात यह भी कही है कि “ब्रह्मा, विश्वस्रष्टा ( प्रजापति ), धर्म, महत्तत्त्व और अव्यक्त-इन्हें विचारवान् पुरुष उत्तम सात्त्विकी गति बतलाते हैं ।¹” तथा “पाँच भूतोंमें लीन हो जाता है” यह स्मृति देवसार्ष्टिसे भूतोंमें लय होनेको पृथक् दिखलाती है । जो लोग यहाँ 'भूतान्यप्येति' के स्थानमें 'भूतान्यत्येति' ( भूतोंको पार कर जाता है ) ऐसा पाठ करते हैं, उनकी बुद्धि ही वेदके विषयमें सङ्कुचित है, अतः उनका कोई दोष नहीं है । | | न चार्थवादत्वमध्यायस्य<br><br>ब्रह्मान्तकर्मविपाकार्थस्य तद्व्यति-<br>रिक्तात्मज्ञानार्थस्य च कर्मकाण्डो-<br>पनिषद्द्वयां तुल्यार्थत्वदर्शनात् ।<br><br>विहिताकरणप्रतिषिद्धकर्मणां च<br><br>स्थावरश्वसूकरादिफलदर्शनात्,<br><br>वान्ताश्यादिप्रेतदर्शनाच्च । | ब्रह्मलोकपर्यन्त कर्मविपाक जिसका विषय है तथा उससे भिन्न जो आत्मज्ञान है, वह जिसका प्रयोजन है, ऐसे इस अध्यायको अर्थवाद भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि कर्मकाण्ड और उपनिषद् इन दोनोंसे इसकी समानार्थता देखी जाती है । तथा विहित कर्मोंके न करने और प्रतिषिद्धोंके करनेका फल स्थावर एवं श्वान-सूकरादि योनियोंकी प्राप्ति देखा जाता है और उन्हें वमन भक्षण करनेवाले आदि प्रेत होते भी देखा जाता है । |


१. इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानयुक्त नित्य कर्मोंका फल संसार ही है, अवश्य ही है वह सात्त्विक ।
२. इष्टदेवके समान ऐश्वर्यप्राप्ति ।