बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 697, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 697
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६८७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न च श्रुतिस्मृतिविहितप्रतिषिद्धव्यतिरेकेण विहितानि वा प्रतिषिद्धानि वा कर्माणि केनचिदवगन्तुं शक्यन्ते, येषामकरणादनुष्ठानाच्च प्रेतश्वसूकरस्थावरादीनि कर्मफलानि प्रत्यक्षानुमानाभ्यामुपलभ्यन्ते; न चैषां कर्मफलत्वं केनचिदभ्युपगम्यते । तस्माद्विहिताकरणप्रतिषिद्धसेवांनां यथैते कर्मविपाकाः प्रेततिर्यक्स्थावरादयः, तथोत्कृष्टेष्वपि ब्रह्मान्तेषु कर्मविपाकत्वं वेदितव्यम् । तस्मात् 'स आत्मनो वपामुदखिदत्' 'सोऽरोदीत्' इत्यादिवन्नाभूतार्थवादत्वम् ! | और श्रुति-स्मृतिद्वारा जो विहित एवं प्रतिषिद्ध कर्म हैं, उनके सिवा दूसरे विहित अथवा प्रतिषिद्ध कर्मोंका किसीको भी ज्ञान नहीं हो सकता, जिनके न करने और करनेसे प्रत्यक्ष एवं अनुमानद्वारा प्रेत, श्वान, सूकर एवं स्थावरादि कर्मफल प्राप्त होते हैं। उनके कर्मफलोंकी कोई कल्पना ही कर लेता हो—ऐसी बात नहीं है। अतः जिस प्रकार विहित कर्मोंके न करने और प्रतिषिद्धोंके करनेके ये प्रेत, तिर्यक् एवं स्थावरादि कर्मफल हैं, उसी प्रकार ब्रह्मापर्यन्त उत्कृष्ट पदोंको भी कर्मफल ही समझना चाहिये। अतः 'स आत्मनो वपामुदखिदत्' [१] 'सोऽरोदीत्' [२] इत्यादि प्रकरणोंके समान इस अध्यायकी अभूतार्थवादता नहीं है। |
| तत्राप्यभूतार्थवादत्वं माभूदिति चेत् ? भवत्वेवम्; न चैतावता अस्य न्यायस्य बाधो भवति; न चास्मत्पक्षो वा दुष्यति, न च "ब्रह्मा विश्वसृजः" इत्यादीनां काम्यकर्मफलत्वं शक्यं वक्तुम्, तेषां देवसार्ष्टितायाः फलस्योक्तत्वात् । | यदि कहो कि इन प्रकरणोंमें भी अभूतार्थवादता नहीं माननी चाहिये तो ऐसा ही सही; किंतु इतनेहीसे इस न्यायका बाध नहीं होता और न हमारा पक्ष ही दूषित होता है। "ब्रह्मा विश्वसृजः" इत्यादिको काम्य कर्मोंका फल भी नहीं बतलाया जा सकता; क्योंकि उन काम्यकर्मोंका फल तो देवसार्ष्टिता बतलाया गया |
१. उस (ब्रह्मा) ने अपना वीर्य पतन किया।
२. वह (रुद्र) रोया।