बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 699, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६८९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| न च प्रमाणान्तरविरुद्धार्थविषये श्रुतेः प्रामाण्यं कल्प्यते, यथा शीतोऽग्निः क्लेदयतीति। श्रुते तु तादर्थ्ये वाक्यस्य प्रमाणान्तरस्य आभासत्वम्। यथा खद्योतोऽग्निरिति, तलमलिनमन्तरिक्षमिति बालानां यत् प्रत्यक्षमपि तद्विषय-प्रमाणान्तरस्य यथार्थत्वे निश्चिते, निश्चितार्थमपि बालप्रत्यक्षम् आभासीभवति। | और जो विषय प्रमाणान्तरसे विरुद्ध है, उसमें श्रुतिप्रामाण्यकी कल्पना भी नहीं की जा सकती, जैसे कोई कहे कि 'अग्नि शीतल होता है और भिगो देता है।'¹ वाक्यका वैसा अर्थ यदि श्रुतिसम्मत हो तो अन्य प्रमाण प्रमाणाभास हो जाते हैं। जैसे मूर्खोंको यह प्रत्यक्ष होता है कि खद्योत अग्नि है, अन्तरिक्षका तल मलिन होता है; तथापि उनके विषयमें यथार्थताका प्रमाणान्तरसे निश्चय हो जानेपर वह मूर्खोंद्वारा प्रत्यक्ष किया हुआ निश्चित अर्थ भी मिथ्या हो जाता है। |
| (प्रकरणार्थ-निर्धारणम्) तस्माद् वेदप्रामाण्यस्याव्यभिचारात्तादर्थ्ये सति वाक्यस्य तथात्वं स्यात्, न तु पुरुषमतिकौशलम्। न हि पुरुषमतिकौशलात् सविता रूपं न प्रकाशयति। तथा वेदवाक्यानि | अतः वेदके प्रामाण्यका सर्वदा अव्यभिचार होनेके कारण उसका वैसा तात्पर्य होनेपर ही वाक्यकी यथार्थता होती है, केवल मनुष्यकी बुद्धिका कौशल ही वाक्यार्थका निर्णय नहीं कर सकता।² पुरुषकी बुद्धिके कौशलसे ही यह सिद्ध नहीं हो सकता कि सूर्य प्रकाश नहीं करता। इसी प्रकार वेदवाक्योंका भी |
१. यह बात प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध है, इसलिये यदि कोई ऐसा वाक्य हो तो वह प्रमाण नहीं माना जा सकता।
२. तात्पर्य यह है कि उपक्रम और उपसंहारादि लिङ्गोंसे जिस वाक्यका जैसा तात्पर्य होता है, वही प्रमाणभूत माना जाता है, केवल बुद्धिकौशलसे कल्पना किया हुआ अर्थ प्रामाणिक नहीं होता।
बृ० उ० ४४—