बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 700, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| श्रापि नान्यार्थानि भवन्ति तस्मान्न मोक्षार्थानि कर्माणीति सिद्धम् । अतः कर्मफलानां संसारत्वप्रदर्शनायैव ब्राह्मणमारभ्यते— | [विभिन्न बुद्धियोंके अनुसार] भिन्न-भिन्न अर्थ नहीं किया जा सकता अतः यह सिद्ध हुआ कि कर्मोंका फल मोक्ष नहीं है। अतः कर्मफलोंका संसारत्व प्रदर्शित करनेके लिये ही यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है— |
पारिक्षित कहाँ रहे ?
अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच । मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद् दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् सुधन्वाङ्गिरस इति तं यदा लोकानामन्तानपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे लाह्यायनि भुज्युने पूछा। वह बोला 'हे याज्ञवल्क्य ! हम व्रताचरण करते हुए मद्रदेशमें विचर रहे थे कि कपि-गोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर पहुँचे। उसकी पुत्री गन्धर्वसे गृहीत थी। [अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था] हमने उससे पूछा, 'तू कौन है?' वह बोला 'आङ्गिरस सुधन्वा हूँ।' जब उससे लोकोंके अन्तके विषयमें पूछा तो हमने उससे यों कहा, 'पारिक्षित कहाँ रहे ? पारिक्षित कहाँ रहे ?' सो हम तुमसे पूछते हैं कि 'पारिक्षित कहाँ रहे ?' ॥ १ ॥
| अथानन्तरम् उपरते जारत्कारवे, भुज्युरीति नामतो लह्यस्यापत्यं | फिर—इसके पश्चात् जरत्कारुपुत्र आर्तभागके चुप हो जानेपर भुज्युनामवाले |