भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 701, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 701

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६९१


लाह्यस्तदपत्यं लाह्यायनिः पप्रच्छ ।<br>याज्ञवल्क्येति होवाच ।लाह्यायनि–लाह्यके पुत्रको लाह्य कहते हैं, उसके पुत्र लाह्यायनिने पूछा । उसने कहा, 'हे याज्ञवल्क्य !'
आदावुक्तमश्वमेधदर्शनम्;<br>समष्टिव्यष्टि फलश्चाश्वमेधक्रतुः,<br>ज्ञानसमुच्चितो वा केवलज्ञान-<br>सम्पादितो वा, सर्वकर्मणां परा<br>काष्ठा; भ्रूणहत्याश्वमेधाभ्यां न<br>परं पुण्यपापयोरिति हि स्मरन्ति;<br>तेन हि समष्टिव्यष्टीश्च प्राप्नोति;<br>तत्र व्यष्टयो निर्ज्ञाता अन्तरण्ड-<br>विषया अश्वमेधयागफलभूताः;<br>'मृत्युरास्यात्मा भवत्येतासां<br>देवतानामेका भवति' ( १ ।<br>२ । ७ ) इत्युक्तम् ।[ इस उपनिषद्के ] आरम्भमें अश्वमेधदर्शन कहा गया है । अश्वमेध यज्ञ समष्टि और व्यष्टि फल देनेवाला है । वह ज्ञानसमुच्चित हो अथवा केवल ज्ञानसम्पादित हो समस्त कर्मोंकी पराकाष्ठा है । भ्रूणहत्यासे बढ़कर कोई पाप और अश्वमेधसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं है—ऐसी स्मृति है । उस ( अश्वमेध ) के द्वारा ही पुरुष समष्टि या व्यष्टि फलको प्राप्त करता है । उनमें जो अश्वमेधयागके फलभूत [ अग्नि, वायु और आदित्यादि ] अण्डान्तर्गत देवता हैं, वे व्यष्टि जाने गये हैं तथा [ समष्टि देवताके विषयमें ] 'मृत्यु इसका आत्मा हो जाता है, यह इन देवताओंमेंसे कोई एक हो जाता है' ऐसा कहा है ।
मृत्युश्चाशनायालक्षणो बुद्ध्या-<br>त्मा समष्टिः प्रथमजो वायुः सूत्रं<br>सत्यं हिरण्यगर्भः; तस्य व्याकृतो<br>विषयः–यदात्मकं सर्वं द्वैतैकत्वम्।वह मृत्यु क्षुधारूप बुद्ध्यात्मा और समष्टि है, वह प्रथमोत्पन्न वायु, सूत्रात्मा, सत्य और हिरण्यगर्भ है । जितना भी सम्पूर्ण द्वैत ( व्यष्टि ) और एकत्व ( समष्टि ) है, उसका जो स्वरूपभूत है, वह व्याकृत उसका