भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 733, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 733

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ७२३


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पारिव्राज्ये तावदध्ययनं विहितम्—“वेदसंन्यसनाच्छूद्रस्तस्माद् वेदं न संन्यसेत्” इति । “स्वाध्याय एवोत्सृज्यमानो वाचम्” इति च आपस्तम्बः । “ब्रह्मोज्झं वेदनिन्दा च कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः । गर्हितान्नाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥” इति वेदपरित्यागे दोषश्रवणात् । “उपासने गुरूणां वृद्धानामतिथीनां होमे जप्यकर्मणि भोजन आचमने स्वाध्याये च यज्ञोपवीती स्यात्” इति परिव्राजकधर्मेषु च गुरूपसनस्वाध्यायभोजनाचमनादीनां कर्मणां श्रुतिस्मृतिषु कर्तव्यतया चोदितत्वाद् गुर्वाद्युपासनाङ्गत्वेन यज्ञोपवीतस्य विहितत्वात् तत्परित्यागो नैवावगन्तुं शक्यते । यद्यप्येषणाभ्यो व्युत्थानं विधीयत एव, तथापि पुत्राद्येषणाभ्यस्तिसृभ्य एव व्युत्थानं न तु सर्वस्मात् कर्मणः कर्मसाधनाच्च व्युत्थानम्करना चाहिये।” पारिव्राज्यमें भी अध्ययन तो विहित है ही; “वेदका त्याग करनेसे शूद्र हो जाता है, इसलिये वेदका त्याग न करे।” आपस्तम्बने भी कहा है, “वाणीका त्याग करनेवालेको केवल स्वाध्याय ही करना चाहिये।” तथा “वेदका त्याग, वेदकी निन्दा, कूट-साक्ष्य, मित्रका वध तथा गर्हित अन्न और भक्ष्य भोजन करना—ये छः सुरापानके समान हैं” इस प्रकार वेदत्यागमें दोष सुना गया है। “गुरु, वृद्ध और अतिथियोंकी उपासनामें, होममें, जपकर्ममें, भोजनमें, आचमनमें और स्वाध्यायमें यज्ञोपवीती होना चाहिये।” इस प्रकार श्रुति और स्मृतियोंमें परिव्राजकोंके धर्मोंमें भी गुरुकी उपासना, भोजन और आचमन आदि कर्मोंका कर्तव्यरूपसे विधान किया गया है, इसलिये गुरु आदिकी उपासनाके अङ्गरूपसे यज्ञोपवीतका विधान होनेके कारण उसका परित्याग उचित नहीं माना जा सकता, यद्यपि एषणाओंसे व्युत्थान करनेका विधान है ही, तथापि पुत्रादि तीन ही एषणाओंसे व्युत्थान करना चाहिये, सारे ही कर्म और कर्मसाधनोंसे व्युत्थान करनेकी आवश्यकता नहीं