भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 734, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 734
७२४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| सर्वपरित्यागे चाश्रुतं कृतं स्यात् श्रुतं च यज्ञोपवीतादि हापितं स्यात्; तथा च महानपराधो विहिताकरणप्रतिषिद्धाचरणनिमित्तः कृतः स्यात्; तस्माद् यज्ञोपवीतादिलिङ्गपरित्यागोऽन्धपरम्परैव । <br><br> उक्ताक्षेपनिरासः<br> न; “यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद् वर्जयेद्यतिः” (कठश्रुतिः ४) इति श्रुतेः । अपि च आत्मज्ञानपरत्वात् सर्वस्या उपनिषदः—आत्मा द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्य इति हि प्रस्तुतम्; स चात्मैव साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तरः अशनायादिसंसारधर्मवर्जित इत्येवं विज्ञेय इति तावत् प्रसिद्धम् । सर्वा हीयमुपनिषद् एवम्परेति विध्यन्तरशेषत्वं तावन्नास्ति, अतो नार्थवादः, आत्मज्ञानस्य कर्तव्यत्वात्; आत्मा च अशनायादिधर्मवान्न भवतीति साधनफलविलक्षणो ज्ञातव्यः, अतो- | है। सबका परित्याग करनेपर तो अविहितका अनुष्ठान और यज्ञोपवीतादि विहितका परित्याग हो जायगा। और इस प्रकार तो विहितका पालन न करने और निषिद्ध कर्मका आचरण करनेके कारण महान् अपराध हो जायगा। अतः यज्ञोपवीतादि लिङ्गोंका परित्याग अन्धपरम्परा ही है। <br><br> सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि “यति यज्ञोपवीत एवं वेद इन सभीका त्याग कर दे” ऐसी श्रुति है। इसके सिवा सारी उपनिषदें भी आत्मज्ञानपरक ही हैं—और 'आत्मा साक्षात् करनेयोग्य, श्रवण करनेयोग्य एवं मनन करने योग्य है' इस प्रकार आत्मज्ञानका उपक्रम किया गया है; तथा यह भी प्रसिद्ध ही है कि वह आत्मा ही साक्षात्, अपरोक्ष, सर्वान्तर और क्षुधादि संसारधर्मोंसे रहित है—इस प्रकार जानना चाहिये। इस सारी उपनिषद्का तात्पर्य इसीमें है, यह किसी दूसरी विधिके शेषभूत नहीं है, इसलिये अर्थवाद नहीं है; क्योंकि आत्मज्ञान तो कर्तव्य है और आत्मा क्षुधादि धर्मोंवाला है नहीं, इसलिये उसे साधन और फलसे विलक्षण ही |