भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 735, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 735

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७२५


संस्कृतहिन्दी
ऽव्यतिरेकेणात्मनो ज्ञानमविद्या—"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८—१६) इत्यादिश्रुतिभ्यः। क्रियाफलं साधनं च अशनायादिसंसारधर्मातीतादात्मनोऽन्यदविद्याविषयम्—"यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) "अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद" (१।४।१०) "अथ येऽन्यथातो विदुः" (छा० उ० ७।२५।२) इत्यादिवाक्यशतेभ्यः।समझना चाहिये। अतः आत्माको इनसे अविलक्षणरूपसे जानना ही अविद्या है; जैसा कि "यह ब्रह्म अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता", "जो यहाँ नानावत् देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है", "निरन्तर एकरूपसे ही देखना चाहिये", "एक ही अद्वितीय ब्रह्म है", "वह तू है" इत्यादि श्रुतियोंसे विदित होता है। कर्मफल और उसके साधन तो क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे अतीत आत्मासे भिन्न अविद्याके अन्तर्गत हैं; जैसा कि "जहाँ द्वैत-सा होता है" "यह अन्य है, मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता", "और जो इससे अन्य प्रकारसे जानते हैं" इत्यादि सैकड़ों श्रौत वाक्योंसे सिद्ध होता है।
न च विद्याविद्ये एकस्य पुरुषस्य सह भवतः, विरोधात्—तमःप्रकाशविव; तस्मादात्मविदोऽविद्याविषयोऽधिकारो न द्रष्टव्यः क्रियाकारकफलभेदरूपः, मृत्योःइसके सिवा एक ही पुरुषमें विद्या और अविद्या साथ-साथ रह नहीं सकतीं, क्योंकि उनमें अन्धकार और प्रकाशके समान परस्पर विरोध है; इसलिये आत्मवेत्ताका क्रिया, कारक और फलका भेदरूप अविद्या-विषयक अधिकार नहीं देखना