भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 736
७२६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
स मृत्युमाप्नोति' इत्यादिनान्निन्दितत्वात्; सर्वक्रियासाधनफलानां चाविद्याविषयाणां तद्विपरीतात्मविद्यया हातव्यत्वेनेष्टत्वात्, यज्ञोपवीतादिसाधनानां च तद्विषयत्वात् ।<br><br>तस्मात्साधनफलस्वभावादात्मनोऽन्यविषया विलक्षणैषणा । उभे ह्येते साधनफले एषणे एव भवतः, यज्ञोपवीतादेस्तत्साध्यकर्मणां च साधनत्वात्, ‘उभे ह्येते एषणे एव’ इति हेतुवचनेनावधारणात् । यज्ञोपवीतादिसाधनात् तत्साध्येभ्यश्च कर्मभ्योऽविद्याविषयत्वाद् एषणारूपत्वाच्च जिहासितव्यरूपत्वाच्च व्युत्थानं विधित्सितमेव ।<br><br>(व्युत्थानश्रुतेः विद्यास्तुत्यर्थत्वमाशङ्क्यते) ननु उपनिषद आत्मज्ञानपरत्वाद् व्युत्थानश्रुतिः तत्स्तुत्यर्था, न विधिः ।चाहिये, क्योंकि 'वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है' इत्यादि रूपसे उसकी निन्दा की गयी है; तथा अविद्याके विषयभूत सम्पूर्ण क्रिया, साधन और फल उससे विपरीत आत्मविद्याद्वारा हेयरूपसे इष्ट हैं, एवं यज्ञोपवीतादि साधन भी उस (अविद्या) के विषय हैं।<br><br>अतः जो साधन और फलसे भिन्न स्वभाववाला है, उस आत्मासे एषणा भिन्नविषयीणी एवं विलक्षण है। ये साधन और फल दोनों एषणाएँ ही हैं, यज्ञोपवीतादि और उनसे साध्य कर्म भी साधन ही हैं; (अतः वे भी एषणाएँ हैं) क्योंकि 'ये (साध्य और साधन) दोनों एषणाएँ ही हैं'—इस हेतुसूचक वाक्यसे यही निश्चय किया गया है। अतः यज्ञोपवीतादि साधनसे और उससे साध्य कर्मोंसे व्युत्थानका विधान करना अभीष्ट ही है, क्योंकि वे अविद्याके विषय एवं एषणारूप हैं और इनका त्याग ही अभीष्ट है।<br><br>पूर्व०—किंतु उपनिषदें तो आत्मज्ञानपरक हैं, इसलिये व्युत्थानश्रुति उसकी स्तुतिके लिये है, वह विधि नहीं है।