बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 737, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 737
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२७ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| न; विधित्सितविज्ञानेन समानकर्तृकत्वश्रवणात्।<br><br>(तन्निरसनम्)<br>न हि अकर्तव्येन कर्तव्यस्य समानकर्तृकत्वेन वेदे कदाचिदपि श्रवणं सम्भवति; कर्तव्यानामेव हि अभिषवहोमभक्षाणां यथा श्रवणम्, अभिषुत्य हुत्वा भक्षयन्तीति, तद्वदात्मज्ञानैषणाव्युत्थानभिक्षाचर्याणां कर्तव्यानामेव समानकर्तृकत्वश्रवणं भवेत्। | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिसकी विधि करनी अभीष्ट है, उस विज्ञानका और इसका श्रुतिने एक ही कर्ता बतलाया है। वेदमें अकर्तव्यके साथ कर्तव्यका समानकर्तृकरूपसे (अर्थात् वे दोनों एक ही कर्ताद्वारा कर्तव्य हैं—इस प्रकारसे) श्रवण होना कभी सम्भव नहीं है। जिस प्रकार सोम निकालना, हवन करना और भक्षण करना—इन कर्तव्यकर्मोंका ही ‘सोम निकालकर हवन करके भक्षण करते हैं’ इस प्रकार एककर्तृकरूपसे विधान किया गया है, उसी प्रकार आत्मज्ञान, एषणाव्युत्थान और भिक्षाचर्या—इन कर्तव्योंका ही समानकर्तृकत्व श्रवण होना सम्भव हो सकता है। |
| अविद्याविषयत्वादेषणात्वाच्च अर्थप्राप्त आत्मज्ञानविधेरेव यज्ञोपवीतादिपरित्यागः, न तु विधातव्य इति चेत् ! | यदि कहो कि अविद्याका विषय और एषणारूप होनेके कारण यज्ञोपवीतादिका परित्याग तो आत्मज्ञानकी विधिसे ही स्वतः प्राप्त हो जाता है, उसके लिये विधि करनेकी आवश्यकता नहीं है—तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, |
| न, सुतरामात्म नविधिनेव विहितस्य समानकर्तृकत्वश्रवणेन | क्योंकि जिस प्रकार आत्मज्ञानकी विधिसे ही विहित व्युत्थानका उसी कर्ताके द्वारा कर्तव्यत्व श्रवण होनेसे और भी पुष्टि हो जाती है, उसी प्रकार ऐसी विधि |