बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| सर्वपरित्यागे चाश्रुतं कृतं स्यात् श्रुतं च यज्ञोपवीतादि हापितं स्यात्; तथा च महानपराधो विहिताकरणप्रतिषिद्धाचरणनिमित्तः कृतः स्यात्; तस्माद् यज्ञोपवीतादिलिङ्गपरित्यागोऽन्धपरम्परैव । <br><br> उक्ताक्षेपनिरासः<br> न; “यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद् वर्जयेद्यतिः” (कठश्रुतिः ४) इति श्रुतेः । अपि च आत्मज्ञानपरत्वात् सर्वस्या उपनिषदः—आत्मा द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्य इति हि प्रस्तुतम्; स चात्मैव साक्षादपरोक्षात् सर्वान्तरः अशनायादिसंसारधर्मवर्जित इत्येवं विज्ञेय इति तावत् प्रसिद्धम् । सर्वा हीयमुपनिषद् एवम्परेति विध्यन्तरशेषत्वं तावन्नास्ति, अतो नार्थवादः, आत्मज्ञानस्य कर्तव्यत्वात्; आत्मा च अशनायादिधर्मवान्न भवतीति साधनफलविलक्षणो ज्ञातव्यः, अतो- | है। सबका परित्याग करनेपर तो अविहितका अनुष्ठान और यज्ञोपवीतादि विहितका परित्याग हो जायगा। और इस प्रकार तो विहितका पालन न करने और निषिद्ध कर्मका आचरण करनेके कारण महान् अपराध हो जायगा। अतः यज्ञोपवीतादि लिङ्गोंका परित्याग अन्धपरम्परा ही है। <br><br> सिद्धान्ती— ऐसी बात नहीं है, क्योंकि “यति यज्ञोपवीत एवं वेद इन सभीका त्याग कर दे” ऐसी श्रुति है। इसके सिवा सारी उपनिषदें भी आत्मज्ञानपरक ही हैं—और 'आत्मा साक्षात् करनेयोग्य, श्रवण करनेयोग्य एवं मनन करने योग्य है' इस प्रकार आत्मज्ञानका उपक्रम किया गया है; तथा यह भी प्रसिद्ध ही है कि वह आत्मा ही साक्षात्, अपरोक्ष, सर्वान्तर और क्षुधादि संसारधर्मोंसे रहित है—इस प्रकार जानना चाहिये। इस सारी उपनिषद्का तात्पर्य इसीमें है, यह किसी दूसरी विधिके शेषभूत नहीं है, इसलिये अर्थवाद नहीं है; क्योंकि आत्मज्ञान तो कर्तव्य है और आत्मा क्षुधादि धर्मोंवाला है नहीं, इसलिये उसे साधन और फलसे विलक्षण ही |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७२५
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७२५
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| ऽव्यतिरेकेणात्मनो ज्ञानमविद्या—"अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) "मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) "एकमेवाद्वितीयम्" (छा० उ० ६।२।१) "तत्त्वमसि" (छा० उ० ६।८—१६) इत्यादिश्रुतिभ्यः। क्रियाफलं साधनं च अशनायादिसंसारधर्मातीतादात्मनोऽन्यदविद्याविषयम्—"यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २।४।१४) "अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद" (१।४।१०) "अथ येऽन्यथातो विदुः" (छा० उ० ७।२५।२) इत्यादिवाक्यशतेभ्यः। | समझना चाहिये। अतः आत्माको इनसे अविलक्षणरूपसे जानना ही अविद्या है; जैसा कि "यह ब्रह्म अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है वह नहीं जानता", "जो यहाँ नानावत् देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है", "निरन्तर एकरूपसे ही देखना चाहिये", "एक ही अद्वितीय ब्रह्म है", "वह तू है" इत्यादि श्रुतियोंसे विदित होता है। कर्मफल और उसके साधन तो क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे अतीत आत्मासे भिन्न अविद्याके अन्तर्गत हैं; जैसा कि "जहाँ द्वैत-सा होता है" "यह अन्य है, मैं अन्य हूँ—ऐसा जो जानता है, वह नहीं जानता", "और जो इससे अन्य प्रकारसे जानते हैं" इत्यादि सैकड़ों श्रौत वाक्योंसे सिद्ध होता है। |
| न च विद्याविद्ये एकस्य पुरुषस्य सह भवतः, विरोधात्—तमःप्रकाशविव; तस्मादात्मविदोऽविद्याविषयोऽधिकारो न द्रष्टव्यः क्रियाकारकफलभेदरूपः, मृत्योः | इसके सिवा एक ही पुरुषमें विद्या और अविद्या साथ-साथ रह नहीं सकतीं, क्योंकि उनमें अन्धकार और प्रकाशके समान परस्पर विरोध है; इसलिये आत्मवेत्ताका क्रिया, कारक और फलका भेदरूप अविद्या-विषयक अधिकार नहीं देखना |
| ७२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
| ७२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स मृत्युमाप्नोति' इत्यादिनान्निन्दितत्वात्; सर्वक्रियासाधनफलानां चाविद्याविषयाणां तद्विपरीतात्मविद्यया हातव्यत्वेनेष्टत्वात्, यज्ञोपवीतादिसाधनानां च तद्विषयत्वात् ।<br><br>तस्मात्साधनफलस्वभावादात्मनोऽन्यविषया विलक्षणैषणा । उभे ह्येते साधनफले एषणे एव भवतः, यज्ञोपवीतादेस्तत्साध्यकर्मणां च साधनत्वात्, ‘उभे ह्येते एषणे एव’ इति हेतुवचनेनावधारणात् । यज्ञोपवीतादिसाधनात् तत्साध्येभ्यश्च कर्मभ्योऽविद्याविषयत्वाद् एषणारूपत्वाच्च जिहासितव्यरूपत्वाच्च व्युत्थानं विधित्सितमेव ।<br><br>(व्युत्थानश्रुतेः विद्यास्तुत्यर्थत्वमाशङ्क्यते) ननु उपनिषद आत्मज्ञानपरत्वाद् व्युत्थानश्रुतिः तत्स्तुत्यर्था, न विधिः । | चाहिये, क्योंकि 'वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है' इत्यादि रूपसे उसकी निन्दा की गयी है; तथा अविद्याके विषयभूत सम्पूर्ण क्रिया, साधन और फल उससे विपरीत आत्मविद्याद्वारा हेयरूपसे इष्ट हैं, एवं यज्ञोपवीतादि साधन भी उस (अविद्या) के विषय हैं।<br><br>अतः जो साधन और फलसे भिन्न स्वभाववाला है, उस आत्मासे एषणा भिन्नविषयीणी एवं विलक्षण है। ये साधन और फल दोनों एषणाएँ ही हैं, यज्ञोपवीतादि और उनसे साध्य कर्म भी साधन ही हैं; (अतः वे भी एषणाएँ हैं) क्योंकि 'ये (साध्य और साधन) दोनों एषणाएँ ही हैं'—इस हेतुसूचक वाक्यसे यही निश्चय किया गया है। अतः यज्ञोपवीतादि साधनसे और उससे साध्य कर्मोंसे व्युत्थानका विधान करना अभीष्ट ही है, क्योंकि वे अविद्याके विषय एवं एषणारूप हैं और इनका त्याग ही अभीष्ट है।<br><br>पूर्व०—किंतु उपनिषदें तो आत्मज्ञानपरक हैं, इसलिये व्युत्थानश्रुति उसकी स्तुतिके लिये है, वह विधि नहीं है। |
ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२७
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२७ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| न; विधित्सितविज्ञानेन समानकर्तृकत्वश्रवणात्।<br><br>(तन्निरसनम्)<br>न हि अकर्तव्येन कर्तव्यस्य समानकर्तृकत्वेन वेदे कदाचिदपि श्रवणं सम्भवति; कर्तव्यानामेव हि अभिषवहोमभक्षाणां यथा श्रवणम्, अभिषुत्य हुत्वा भक्षयन्तीति, तद्वदात्मज्ञानैषणाव्युत्थानभिक्षाचर्याणां कर्तव्यानामेव समानकर्तृकत्वश्रवणं भवेत्। | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिसकी विधि करनी अभीष्ट है, उस विज्ञानका और इसका श्रुतिने एक ही कर्ता बतलाया है। वेदमें अकर्तव्यके साथ कर्तव्यका समानकर्तृकरूपसे (अर्थात् वे दोनों एक ही कर्ताद्वारा कर्तव्य हैं—इस प्रकारसे) श्रवण होना कभी सम्भव नहीं है। जिस प्रकार सोम निकालना, हवन करना और भक्षण करना—इन कर्तव्यकर्मोंका ही ‘सोम निकालकर हवन करके भक्षण करते हैं’ इस प्रकार एककर्तृकरूपसे विधान किया गया है, उसी प्रकार आत्मज्ञान, एषणाव्युत्थान और भिक्षाचर्या—इन कर्तव्योंका ही समानकर्तृकत्व श्रवण होना सम्भव हो सकता है। |
| अविद्याविषयत्वादेषणात्वाच्च अर्थप्राप्त आत्मज्ञानविधेरेव यज्ञोपवीतादिपरित्यागः, न तु विधातव्य इति चेत् ! | यदि कहो कि अविद्याका विषय और एषणारूप होनेके कारण यज्ञोपवीतादिका परित्याग तो आत्मज्ञानकी विधिसे ही स्वतः प्राप्त हो जाता है, उसके लिये विधि करनेकी आवश्यकता नहीं है—तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, |
| न, सुतरामात्म नविधिनेव विहितस्य समानकर्तृकत्वश्रवणेन | क्योंकि जिस प्रकार आत्मज्ञानकी विधिसे ही विहित व्युत्थानका उसी कर्ताके द्वारा कर्तव्यत्व श्रवण होनेसे और भी पुष्टि हो जाती है, उसी प्रकार ऐसी विधि |
७२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| दार्ढ्योपपत्तिः, तथा भिक्षाचर्यस्य च। | करनेसे भिक्षाचर्याकी भी दृढ़ता होती है; | | यत् पुनरुक्तं वर्तमानापदेशादर्थवादमात्रमिति— | और ऐसा जो कहा कि वर्तमानकालिक प्रयोग होनेसे यह केवल अर्थवादमात्र है, सो यह ठीक नहीं, क्योंकि (औदुम्बरो यूपो भवति—ऐसी) औदुम्बरयूपादिसम्बन्धी विधिके समान होनेके कारण यह भी निर्दोष है। | | न, औदुम्बरयूपादिविधिसमानत्वाददोषः। | | | विद्वदविद्वत्संन्यास-विवेचनम्<br>‘व्युत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति’ इत्यनेन पारिव्राज्यं विधीयते, पारिव्राज्याश्रमे च यज्ञोपवीतादिसाधनानि विहितानि, लिङ्गं च श्रुतिभिः स्मृतिभिश्च। अतस्तद् वर्जयित्वा अन्यस्माद् व्युत्थानम् एषणात्वेऽपीति चेत् ? | पूर्व०—'व्युत्थाय भिक्षाचर्यं चरन्ति' इस वाक्यसे संन्यासका विधान किया जाता है और संन्यासाश्रममें श्रुति-स्मृतियोंद्वारा यज्ञोपवीतादि साधन एवं (त्रिदण्डादि) लिङ्गका विधान किया गया है। अतः एषणा होनेपर भी इन्हें छोड़कर अन्य एषणाओंसे ही व्युत्थान करना चाहिये ऐसा कहें तो ? | | न, विज्ञानसमानकर्तृकात् पारिव्राज्यादेषणाव्युत्थानलक्षणात् पारिव्राज्यान्तरोपपत्तेः; यदि तदेषणाभ्यो व्युत्थानलक्षणं पारिव्राज्यं तदात्मज्ञानाङ्गम्, आत्मज्ञान- | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है क्योंकि विज्ञानका जो कर्ता है, उसीके द्वारा किये जानेवाले एषणाव्युत्थानरूप संन्याससे भिन्न प्रकारका भी संन्यास होना सम्भव है। यह जो एषणाओंसे ऊपर उठनारूप संन्यास है; वह आत्मज्ञानका अङ्ग है, क्योंकि यह |
१. इस वाक्यमें 'भवति' क्रिया वर्तमानकालिक होनेपर भी इसका 'गूलरका यूप होना चाहिये' ऐसा विधिपरक अर्थ किया जाता है।
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| विरोध्येषणापरित्यागरूपत्वात्; अविद्याविषयत्वाच्चैषणायाः; तद्व्यतिरेकेण चास्त्याश्रमरूपं पारिव्राज्यं ब्रह्मलोकादिफलप्राप्तिसाधनम्, यद्विषयं यज्ञोपवीतादिसाधनविधानं लिङ्गविधानं च। | आत्मज्ञानकी विरोधिनी एषणाओंका परित्यागरूप है; कारण, एषणाएँ तो अविद्याका विषय हैं; उक्त संन्याससे भिन्न आश्रमरूप संन्यास ब्रह्मलोकादि फलकी प्राप्तिका साधन-भूत है, जिसके विषयमें कि यज्ञोपवीतादि साधन और लिङ्गोंका विधान किया गया है। |
| न च एषणारूपसाधनोपादानस्य आश्रमधर्ममात्रेण पारिव्राज्यान्तरे विषये सम्भवति सति, सर्वोपनिषद्विहितस्य आत्मज्ञानस्य बाधनं युक्तम्, यज्ञोपवीताद्यविद्याविषयैषणारूपसाधनोपादित्सायां चावश्यम् असाधनफलरूपस्य अशनायादिसंसारधर्मवर्जितस्य अहं ब्रह्मास्मि, इति विज्ञानं बाध्यते; न च तद्बाधनं युक्तम्, सर्वोपनिषदां तदर्थपरत्वात्। | तथा अन्य प्रकारके संन्यासमें आश्रमधर्ममात्रसे एषणारूप साधनोंका ग्रहण सम्भव है—इतनेहीसे सम्पूर्ण उपनिषदोंद्वारा प्रतिपाद्य आत्मज्ञानका बाध होना उचित नहीं है, यज्ञोपवीतादि अविद्याविषयक एषणारूप साधनोंको ग्रहण करनेकी इच्छा रहनेपर तो इस असाधन-फलरूप एवं क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे रहित आत्माके 'मैं ब्रह्म हूँ' विज्ञानका अवश्य बाध हो जायगा; और उसका बाध होना उचित नहीं है; क्योंकि समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य उसीमें है। |
| 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' इत्येषणां ग्राहयन्ती श्रुतिः स्वयमेव बाधत इति चेत्? अथापि स्यादेषणाभ्यो व्युत्थानं विधाय पुनरेषण- | पूर्व०-किंतु 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' यह एषणाको ग्रहण करानेवाली श्रुति तो स्वयं ही उसका बाध कर रही है। तात्पर्य यह है कि यदि यह मान भी लिया जाय तो भी एषणाओंसे व्युत्थानका विधान करके श्रुति एषणाके ही एक देश |
७३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| कदेशं भिक्षाचर्यं ग्राहयन्ती तत्स- | भिक्षाचर्याका ग्रहण करानेके कारण उससे सम्बद्ध अन्य एषणाओं- | | म्बद्धमन्यदपि ग्राहयतीति चेत् ? | का भी ग्रहण कराती ही है—यदि ऐसा कहें तो ! | | न, भिक्षाचर्यस्याप्रयोजकत्वाद् | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि हवनके पश्चात् भोजन | | हुत्वोत्तरकालभक्षणवत्। शेषप्रति- | करनेके समान भिक्षाचर्या किसी फलकी प्रयोजिका नहीं है, हवनके | | पत्तिकर्मत्वादप्रयोजकं हि तत्; | पश्चात् भोजन कराना भी शेषप्रतिपत्तिकर्म होनेके कारण किसी | | असंस्कारकत्वाच्च—भक्षणं पुरुष- | फलका प्रयोजक नहीं है; इसके सिवा संस्कार न करनेवाली होनेसे | | संस्कारकमपि स्यात्, न तु | भी भिक्षाचर्या प्रयोजिका नहीं है, हुतशेषका भक्षण तो पुरुषके संस्कार- | | भिक्षाचर्यम्; नियमादृष्टस्यापि | का हेतु भी होता है, किंतु भिक्षाचर्या वैसी भी नहीं है; क्योंकि नियमविधिजनित अदृष्ट भी ब्रह्म- | | ब्रह्मविदोऽनिष्टत्वात् । | वेत्ताको अनिष्ट ही है। | | नियमादृष्टस्यानिष्टत्वे किं | पूर्व०—यदि उसे नियमविधिजनित अदृष्ट इष्ट नहीं है तो भिक्षा- | | भिक्षाचर्येणेति चेत् ! | चर्याका क्या प्रयोजन है?—ऐसा कहें तो ? | | न, अन्यसाधनाद् व्युत्थानस्य | सिद्धान्ती—यह ठीक नहीं, क्योंकि अन्य साधनोंसे तो व्युत्थान करनेका विधान किया गया है। | | विहितत्वात् । तथापि किं तेनेति | इसपर भी यदि तुम कहो कि निष्क्रिय आत्मज्ञानसे सर्वनिवृत्ति तो हो ही जायगी फिर भिक्षा- | | चेत् ? यदि स्यात्, बाढमभ्यु- | चर्यासे क्या प्रयोजन है ? तो ठीक हे, यदि ऐसा हो जाय तो हम भी |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३१ |
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३१ |
|---|
| पगम्यते हि तत् । यानि पारिव्राज्येऽभिहितानि वचनानि "यज्ञोपवीत्येवाधीयीत" इत्यादीनि, तान्यविद्वत्पारिव्राज्यमात्रविषयाणीति परिहृतानि; इतरथा आत्मज्ञानबाधः स्यादिति ह्युक्तम्; "निराशिपमनारम्भं निर्ममस्कारमस्तुतिम् । अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः" इति सर्वकर्माभावं दर्शयति स्मृतिर्विदुषः; "विद्वाँल्लिङ्गविवर्जितः" "तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञः" इति च । तस्मात् परमहंसपारिव्राज्यमेव व्युत्थानलक्षणं प्रतिपद्येतात्मवित् सर्वकर्मसाधनपरित्यागरूपमिति ।<br><br>यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एतमात्मानम् असाधनफलस्वभावं विदित्वा | उसे स्वीकार करते हैं।^१ संन्यासाश्रममें जो "यज्ञोपवीती होकर ही अध्ययन करे" इत्यादि वचन कहे गये हैं, वे केवल अविद्वत्संन्यासमात्रसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं—ऐसा कहकर उनका परित्याग किया जा चुका है; और यह भी कहा गया है कि यदि ऐसा न मानेंगे [ उन्हें विद्वत्संन्याससम्बन्धी समझेंगे ] तो आत्मज्ञानका बाध हो जायगा ।<br>"जिसे किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो सब प्रकारके आरम्भसे शून्य तथा नमस्कार और स्तुतिसे रहित है, जो स्वयं अक्षीण है, किंतु जिसके कर्मोंका क्षय हो चुका है, उसे देवगण ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते हैं" यह स्मृति विद्वान्के समस्त कर्मोंका अभाव दिखाती है। तथा "विद्वान् लिङ्गरहित होता है" "अतः वह लिङ्गरहित और धर्मज्ञ होता है" इत्यादि वचन भी यही दिखलाते हैं। अतः आत्मवेत्ताको समस्त कर्म साधनोंके परित्यागरूप व्युत्थानलक्षण परमहंस पारिव्राज्यका ही आश्रय लेना चाहिये।<br><br>क्योंकि पूर्ववर्ती ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञ ) लोग इस असाधनफलस्वभाव आत्माको |
१. तथापि क्षुधादिकी निवृत्तिके लिये भिक्षाटनादिकी कर्तव्यता प्राप्त होनेके कारण उसकी विधि सार्थक ही है।
७३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७३२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| सर्वस्मात्साधनफलस्वरूपादेषणा- | जानकर एषणालक्षण साधन और | | लक्षणाद् व्युत्थाय भिक्षाचर्यं | फलस्वरूप समस्त विषयोंसे ऊपर | | चरन्ति स्म, दृष्टादृष्टार्थं कर्म | उठकर अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट फल- | | तत्साधनं च हित्वा, तस्माद् | वाले सम्पूर्ण कर्म और उसके | | अद्यत्वेऽपि ब्राह्मणो ब्रह्मवित् | साधनको छोड़कर भिक्षाचर्या | | पाण्डित्यं पण्डितभावम्, एतदा- | करते थे, इसलिये इस समय भी | | त्मविज्ञानं पाण्डित्यम्, निर्विद्य | ब्राह्मण यानी ब्रह्मवेत्ता पाण्डित्य— | | निःशेषं विदित्वा आत्मविज्ञानं | पण्डितभावको—यह आत्मज्ञान ही | | निरवशेषं कृत्वेत्यर्थः— | पाण्डित्य है, इसे निर्विद्य—निःशेष- | | आचार्यत आगमतश्च, एषणाभ्यो | तया जानकर अर्थात् आचार्य और | | व्युत्थाय—एषणाव्युत्थानाव- | शास्त्रसे पूर्णतया आत्मज्ञान सम्पा- | | सानमेव हि तत् पाण्डित्यम् | दन करके एषणाओंसे व्युत्थान कर, | | एषणातिरस्कारोद्भवत्वादेषणावि- | क्योंकि उस पाण्डित्यका पर्यवसान | | रुद्धत्वात्; एषणामतिरस्कृत्य न | एषणाओंसे व्युत्थान करनेमें ही है, | | ह्यात्मविषयस्य पाण्डित्यस्योद्भव | कारण, वह एषणाओंके तिरस्कारसे | | इत्यात्मज्ञानेनैव विहितमेषणा- | ही उत्पन्न होता है और एषणाओं- | | व्युत्थानम् आत्मज्ञानसमान- | से विरुद्ध भी है, एषणाओंका | | कर्तृकत्वाप्रत्ययोपादानलिङ्ग- | तिरस्कार किये बिना तो आत्म- | | श्रुत्या दृढीकृतम्। तस्मादेष- | विषयक पाण्डित्यका उदय ही नहीं | | णाभ्यो व्युत्थाय ज्ञानबलभावेन | हो सकता; अतः आत्मज्ञानद्वारा | | बाल्येन तिष्ठासेत् स्थातुमिच्छेत्। | ही एषणाओंसे व्युत्थान सम्पादित | | | होता है; आत्मज्ञान और व्युत्थान- | | | का एक ही कर्ता है—यह सूचित | | | करनेके लिये 'व्युत्थाय' इस पदमें | | | 'क्त्वा' प्रत्ययका प्रयोग किया गया | | | है, इसलिये इस लिङ्गभूता श्रुतिने | | | उक्त अभिप्रायको और भी पुष्ट कर | | | दिया है। अतः एषणाओंसे उत्थान | | | कर बाल्यसे—ज्ञानबलभावसे | | | 'तिष्ठासेत्'—स्थित रहनेकी इच्छा | | | करे। |
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३३
| साधनफलाश्रयणं हि बलमितरेषामनात्मविदाम्; तद् बलं हित्वा विद्वान् असाधनफलस्वरूपात्मविज्ञानमेव बलं तद्भावमेव केवलमाश्रयेत्, तदाश्रयणे हि करणान्येषणाविषये एनं हृत्वा स्थापयितुं नोत्सहन्ते; ज्ञानबलहीनं हि मूढं दृष्टादृष्टविषयायाम् एषणायामेवैनं करणानि नियोजयन्ति; बलं नाम आत्मविद्ययाशेषविषयदृष्टितिरस्करणम्; अतस्तद्भावेन बाल्येन तिष्ठासेत्; तथा "आत्मना विन्दते वीर्यम्" ( केन० २।४ ) इति श्रुत्यन्तरात् । "नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः" (मु० उ० ३ । २ । ४ ) इति च । | अन्य जो अनात्मज्ञ हैं, उनका बल तो साधन और फलोंका आश्रय लेना ही है; उस बलको त्यागकर विद्वान्को जो असाधन-फलस्वरूप आत्मविज्ञान ही बल है, केवल उस बलभावका ही आश्रय लेना चाहिये । उसका आश्रय लेनेसे ( विषयलोलुप ) इन्द्रियाँ इसे आकृष्ट करके एषणाओंके विषयमें स्थापित करनेका साहस नहीं कर सकतीं । जो ज्ञानबलसे रहित है, उस मूढको ही इन्द्रियाँ दृष्ट और अदृष्ट विषयोंकी एषणामें नियुक्त कर देती हैं; आत्मज्ञानके द्वारा समस्त विषयदृष्टिका तिरस्कार कर देना ही बल है; अतः उस बलभावसे—बाल्यसे स्थित रहनेको इच्छा करे; ऐसा ही "आत्मज्ञानके द्वारा वीर्य (विषयदृष्टिके तिरस्कारका सामर्थ्य ) प्राप्त होता है" इस अन्य श्रुतिसे विदित होता है, तथा "यह आत्मा बलहीनको नहीं मिल सकता" यह श्रुति भी यहो कहती है । | | बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्य निःशेषं कृत्वाथ मननान्मुनिर्योगी भवति; एतावद्धि ब्राह्मणेन कर्तव्यम्, यदुत सर्वानात्मप्रत्यय- | इस प्रकार बाल्य और पाण्डित्यको निर्विद्य, निःशेष जान करके फिर मुनि—मनन करनेके कारण मुनि—योगी होता है। समस्त अनात्मप्रत्ययोंका तिरस्कार करना—यही ब्राह्मण |
७३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| तिरस्करणम्; एतत् कृत्वा कृतकृत्यो योगी भवति ।<br><br>अमौनं च आत्मज्ञानानात्मप्रत्ययतिरस्कारौ पाण्डित्यबाल्यसंज्ञकौ निःशेषं कृत्वा, मौनं नाम अनात्मप्रत्ययतिरस्करणस्य पर्यवसानं फलम्, तच्च निर्विद्याथ ब्राह्मणः कृतकृत्यो भवति—ब्रह्मैव सर्वमिति प्रत्यय उपजायते । स ब्राह्मणः कृतकृत्यः, अतो ब्राह्मणः; निरुपचरितं हि तदा तस्य ब्राह्मण्यं प्राप्तम्; अत आह—स ब्राह्मणः केन स्यात् केन चरणेन भवेत् ? येन स्याद् येन चरणेन भवेत्, तेनेदृश एवायम्—येन केनचिच्चरणेन स्यात् तेनेदृश एव उक्तलक्षण एव ब्राह्मणो भवति; येन केनचिच्चरणेनेति स्तुत्यर्थम्—येयं ब्राह्मण्यावस्था सेयं स्तूयते, न तु चरणेऽनादरः । | (ब्रह्मवेत्ता) का कर्तव्य है; ऐसा करके वह कृतकृत्य योगी हो जाता है ।<br><br>आत्मज्ञान और अनात्मप्रत्ययका तिरस्कार जिनकी पाण्डित्य और बाल्यसंज्ञा है—ये अमौन हैं, इन्हें निःशेष करके तथा अनात्मप्रत्यय तिरस्कारका पर्यवसान—फल मौन है, उसे भी निःशेष जान करके ब्राह्मण कृतकृत्य हो जाता है । उसे 'सब ब्रह्म ही है' ऐसा प्रत्यय उत्पन्न हो जाता है । वह ब्राह्मण कृतकृत्य है, इसलिये ब्राह्मण है; उस समय उसे उपचारशून्य ब्राह्मणत्व प्राप्त हो जाता है; इसीसे श्रुति कहती है—वह किससे अर्थात् किसी आचरणसे ब्राह्मण हो सकता है ? [ उत्तर— ] जिससे अर्थात् जिस आचरणसे भी हो वह ऐसा ही होगा—तात्पर्य यह है कि जिस किसी भी आचरणसे हो उससे ऐसा यानी ऐसे लक्षणोंवाला ही ब्राह्मण होता है; 'जिस किसी भी आचरणसे' यह कथन स्तुतिके लिये है; अर्थात् ऐसा कहकर यह जो ब्राह्मण्यावस्था है, उसकी स्तुति की जाती है, इससे आचरणमें अनादर प्रदर्शित नहीं होता । |
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३५
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३५
| अत एतस्माद् ब्राह्मणभावस्थानाद् अशनायाद्यतीतात्मस्वरूपाद् नित्यतृप्ताद् अन्यद् अविद्याविषयम् एषणालक्षणं वस्त्वन्तरम्, आर्तं विनाशि आर्तिपरिगृहीतम्, स्वप्नमायामरीच्युदकसमम् असारम्, आत्मैवै कः केवलो नित्यमुक्त इति। ततो ह कहोलः कौषीतकेयः उपरराम ॥ १ ॥ | अतः इस क्षुधादिरहित आत्मस्वरूप नित्यतृप्त ब्राह्मण्यपदमें स्थिति होनेसे भिन्न जो अविद्याकी विषयभूत एषणारूप अन्य वस्तुएं हैं, वे आर्त-विनाशी आर्तिसे व्याप्त अर्थात् स्वप्न, माया और मरुमरीचिकाके जलके समान असार हैं; केवल एक आत्मा ही नित्यमुक्त है। तब कौषीतकेय कहोल उपरत हो गया ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये
पञ्चमं कहोलब्राह्मणम् ॥ ५ ॥
षष्ठ ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-गार्गी-संवाद
| यत् साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म सर्वान्तर आत्मेत्युक्तम्, तस्य सर्वान्तरस्य स्वरूपाधिगमाय आ शाकल्यब्राह्मणाद् ग्रन्थ आरभ्यते । पृथिव्यादीनि ह्याकाशान्तानि भूतानि अन्तर्बहिर्भावेन व्यवस्थितानि; तेषां यद् बाह्यं बाह्यम् अधिगम्याधिगम्य निराकुर्वन् द्रष्टुः साक्षात् सर्वान्तरोऽगौण आत्मा | जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म-सर्वान्तर आत्मा है—ऐसा कहा गया है, उस सर्वान्तरके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये शाकल्यब्राह्मणपर्यन्त आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण भूत अन्तर्बहिर्भावसे स्थित हैं । उनमेंसे जो बाह्य-बाह्य भूत है, उसे जान-जानकर निराकरण करते हुए, जो सम्पूर्ण सांसारिक धर्मोंसे रहित साक्षात् सर्वान्तर मुख्य आत्मा है, |
७३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| सर्वसंसारधर्मविनिर्मुक्तो दर्शयि- <br> तव्य इत्यारम्भः— | उसका दर्शन द्रष्टा (मुमुक्षु) को कराना है; इसलिये यह आरम्भ किया जाता है— |
|---|
जलसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त उत्तरोत्तर अधिष्ठानतत्त्वोंका निरूपण
अथ हैनँ गार्गी वाचक्नवी पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ॒ सर्वमप्स्वोतं च प्रोतं च कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति वायौ गार्गीति कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वन्तरिक्षलोका ओताश्च प्रोताश्चेति गन्धर्व- लोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु गन्धर्वलोका ओताश्च प्रोताश्चेत्यादित्यलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्वा- दित्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति चन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु चन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति नक्षत्र- लोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु नक्षत्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति देवलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु देव- लोका ओताश्च प्रोताश्चेतीन्द्रलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खल्विन्द्रलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोता- श्चेति ब्रह्मलोकेषु गार्गीति कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति स होवाच गार्गि मातिप्राक्षीर्मा ते मूर्धा व्यपप्तदनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि गार्गि मातिप्राक्षीरिति ततो ह गार्गी वाचक्नव्युपरराम ॥१॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे वाचक्नुकी पुत्री गार्गीने पूछा; वह बोली, ‘हे याज्ञवल्क्य ! यह जो कुछ है, सब जलमें ओतप्रोत है, किंतु वह जल
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७
ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७
किसमें ओतप्रोत है?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! वायुमें।' [गार्गी-] 'वायु किसमें ओतप्रोत है?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमें।' [गार्गी-] 'अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! गन्धर्वलोकोंमें।' [गार्गी-] 'गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! आदित्यलोकोंमें।' [गार्गी-] आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! चन्द्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! नक्षत्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! देवलोकोंमें।' [गार्गी-] 'देवलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! इन्द्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'इन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! प्रजापतिलोकोंमें।' [गार्गी-] 'प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! ब्रह्मलोकोंमें।' [गार्गी-] 'ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा- 'हे गार्गि ! अतिप्रश्न मत कर। तेरा मस्तक न गिर जाय ! तू, जिसके विषयमें अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषयमें अतिप्रश्न कर रही है। हे गार्गि ! तू अतिप्रश्न न कर।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥
| अथ हैनँ गार्गी नामतः, | फिर उस याज्ञवल्क्यसे वाचकनवी |
|---|---|
| वाचकनवी वचक्नोर्दुहिता, पप्रच्छ; | वचक्नुकी पुत्रीने, जो नामसे गार्गी थी, पूछा। उसने 'हे याज्ञवल्क्य !' |
| याज्ञवल्क्येति होवाच; यदिदं | इस प्रकार सम्बोधित करके कहा— यह जो कुछ पार्थिव धातुसमुदाय है |
| सर्वं पार्थिवं धातुजातम् अप्सूदके | वह अप्—जलोंमें ओतप्रोत है; ओत—वस्त्रकी लंबाईके तन्तुके |
| ओतं च प्रोतं च, ओतं दीर्घपट- | समान और प्रोत—वस्त्रकी चौड़ाईके तन्तुके समान अथवा इससे उलटा |
| तन्तुवत् प्रोतं तिर्यक्तन्तुवद् विप- | समझो। तात्पर्य यह है कि यह अपने |
बृ० उ० ४७—
७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ]
७३८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३ ]
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| गीतं वा—अद्भिः सर्वतोऽन्तर्बहिर्भूताभिव्याप्तमित्यर्थः; अन्यथा सक्तुमुष्टिवद् विशीर्येत। | बाहर-भीतर सब ओर विद्यमान हुए जलसे ही व्याप्त है, नहीं तो यह सत्तूकी मुट्ठीके समान छिन्न-भिन्न हो जाता। |
| इदं तावदनुमानमुपन्यस्तम्— यत् कार्यं परिच्छिन्नं स्थूलम्, कारणेनापरिच्छिन्नेन सूक्ष्मेण व्याप्तमिति दृष्टम्—यथा पृथिवी अद्भिः; तथा पूर्वं पूर्वमुत्तरेणोत्तरेण व्यापिना भवितव्यम्, इत्येष आ सर्वान्तरादात्मनः प्रश्नार्थः। | यह तो अनुमानका उपन्यास किया गया, इससे यह देखा गया कि जो कार्य, परिच्छिन्न और स्थूल तत्त्व है, वह कारण, अपरिच्छिन्न और सूक्ष्म तत्त्वसे व्याप्त रहता है—जिस प्रकार पृथिवी जलसे व्याप्त है; उसी प्रकार पूर्व-पूर्व जलादि अपने उत्तरोत्तरवर्ती कारण वायु आदिसे व्याप्त हैं; सर्वान्तर आत्मापर्यन्त इस प्रश्नका यही तात्पर्य है। |
| तत्र भूतानि पञ्च संहतान्येवोत्तरमुत्तरं सूक्ष्मभावेन व्यापकेन कारणरूपेण च व्यवतिष्ठन्ते; न च परमात्मनोऽर्वाक् तद्व्यतिरेकेण वस्त्वन्तरमस्ति "सत्यस्य सत्यम्" (बृ० उ० २।१।२०) इति श्रुतेः। सत्यं च भूतपञ्चकम्, सत्यस्य सत्यं च पर आत्मा। | तहाँ, भूत पाँच हैं, जो परस्पर मिलकर ही उत्तरोत्तर व्यापक सूक्ष्मभावसे और कारणरूपसे विद्यमान हैं। परमात्मासे नीचे उससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है जैसा कि "वह सत्य-का-सत्य है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है। पाँचों भूत तो सत्य हैं और परमात्मा सत्य-का-सत्य है। |
| कस्मिन्नु खल्वाप ओताश्च प्रोताश्चेति—तासामपि कार्यत्वात् स्थूलत्वात् परिच्छिन्नत्वाच्च क्वचिद्धि ओतप्रोतभावेन भवितव्यम्; | [ अतः प्रश्न होता है कि ] जल किसमें ओत-प्रोत हैं? कार्य स्थूल और परिच्छिन्न होनेके कारण उन्हें भी किसीमें ओतप्रोतभावसे रहना चाहिये; |
ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३९
| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३९ |
|---|
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| क्क तासामोतप्रोतभाव इति । एवमुत्तरोत्तरप्रश्नप्रसङ्गो योजयितव्यः । वायौ गार्गीति । | तो उनका ओतप्रोतभाव कहाँ है ? इसी प्रकार आगे-आगेके प्रश्नोंके प्रसङ्गकी योजना करनी चाहिये । [ याज्ञवल्क्य— ] 'हे गार्गि ! वायुमें ।' |
| नन्वग्नाविति वक्तव्यम् ! | **शङ्का—**किंतु यहाँ तो याज्ञवल्क्यको 'अग्निमें' ऐसा कहना चाहिये था ! |
| नैष दोषः; अग्नेः पार्थिवं वा आप्यं वा धातुमनाश्रित्य इतरभूतवत् स्वातन्त्र्येण आत्मलाभो नास्तीति तस्मिन्नोतप्रोतभावो नोपदिश्यते । | **समाधान—**ऐसा कहनेमें दोष नहीं है, क्योंकि अन्य भूतोंके समान अग्निके स्वरूपकी सिद्धि किसी पार्थिव या जलीय धातुका आश्रय लिये बिना नहीं होती, इसलिये उसमें ओतप्रोतभावका उपदेश नहीं किया जाता । |
| कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति तान्येव भूतानि संहतान्यन्तरिक्षलोकाः; तान्यपि गन्धर्वलोकेषु, गन्धर्वलोका आदित्यलोकेषु, आदित्यलोकाश्चन्द्रलोकेषु, चन्द्रलोका नक्षत्रलोकेषु, नक्षत्रलोका देवलोकेषु, देवलोका इन्द्रलोकेषु, इन्द्रलोका विराट्शरीरारम्भकेषु भूतेषु प्रजापतिलोकेषु, प्रजापतिलोका ब्रह्मलोकेषु । ब्रह्मलोका नाम अण्डारम्भकाणि भूतानि; सर्वत्र हि सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण | ( गार्गी— ) 'वायु किसमें ओत-प्रोत है ?' ( याज्ञवल्क्य— ) 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमें ।' परस्पर संहत हुए ये भूत ही अन्तरिक्षलोक हैं। वे भी गन्धर्वलोकोंमें, गन्धर्वलोक आदित्यलोकोंमें, आदित्यलोक चन्द्रलोकोंमें, चन्द्रलोक नक्षत्रलोकोंमें, नक्षत्रलोक देवलोकोंमें, देवलोक इन्द्रलोकोंमें, इन्द्रलोक विराट् शरीरके आरम्भक भूतरूप प्रजापतिलोकोंमें और प्रजापतिलोक ब्रह्मलोकोंमें ओतप्रोत हैं। ब्रह्मलोक ब्रह्माण्डके आरम्भक भूतोंको कहते हैं; इन सभी लोकोंमें सूक्ष्मताके तारतम्यक्रमसे प्राणियोंके |
७४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३
| ७४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| प्राण्युपभोगाश्रयाकारपरिणतानि भूतानि संहतानि तान्येव पञ्चेति बहुवचनभाञ्जि। | उपभोगके आश्रय (शरीर) के आकारमें परिणत हुए परस्परसंहत वे ही पाँच भूत हैं, इसलिये वे बहुवचनके भागी हैं। |
| कस्मिन्नु खलु ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति—स होवाच याज्ञवल्क्यो हे गार्गि मातिप्राक्षीः स्वं प्रश्नम्, न्यायप्रकारमतीत्य आगमेन प्रष्टव्यां देवतामनुमानेन मा प्राक्षीरित्यर्थः; पृच्छन्त्याश्च मा ते तव मूर्धा शिरो व्यपप्तद् विस्पष्टं पतेत्; देवतायाः स्वप्रश्न आगमविषयः; तं प्रश्नविषयमतिक्रान्तो गार्ग्याः प्रश्नः; आनुमानिकत्वात् स यस्या देवतायाः प्रश्नः सातिप्रश्न्या, नातिप्रश्न्यानातिप्रश्न्या, स्वप्रश्नविषयैव, केवलागमगम्येत्यर्थः; तामनतिप्रश्न्यां वै देवतामतिपृच्छसि। अतो गार्गि मातिप्राक्षीः, | [गार्गी—] 'अच्छा तो, वे ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे गार्गि! तू अपने प्रश्नको अतिप्रश्न न कर, अर्थात् न्यायोचित प्रकारको छोड़कर आचार्यपरम्पराद्वारा पूछनेयोग्य शास्त्रगम्य देवताको अनुमानसे मत पूछ। इस प्रकार पूछनेसे तेरा मूर्द्धा—मस्तक व्यपतित—विस्पष्टतया पतित न हो जाय!' यह देवताका स्वप्रश्न शास्त्रका विषय है; गार्गीका प्रश्न आनुमानिक होनेके कारण उस प्रश्नविषयका अतिक्रमण कर गया है; यह प्रश्न जिस देवताके विषयमें है, वह अतिप्रश्न्या हो रही है; किंतु वह नातिप्रश्न्या—अतिप्रश्न करनेके अयोग्य अर्थात् अपने प्रश्नकी ही विषय है; तात्पर्य यह है कि 'वह केवल आचार्योपदेशसे शास्त्रद्वारा ही जानी जा सकती है, उस अनतिप्रश्न्या देवताके विषयमें तू अतिप्रश्न करती है। अतः हे गार्गि! यदि तुझे मरनेकी इच्छा न हो तो |
ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१
ब्राह्मण ७] शाङ्करभाष्यार्थ ७४१
| मर्तुं चेन्नेच्छसि। ततो ह गार्गी वाचक्नवी उपरराम ॥ १ ॥ | अतिप्रश्न न कर।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥ |
|---|
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये षष्ठं गार्गीब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
सप्तम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-आरुणि-संवाद
| इदानीं ब्रह्मलोकानामन्तरतमं सूत्रं वक्तव्यमिति तदर्थ आरम्भः; तच्च आगमेनैव प्रष्टव्यमितीतिहासने आगमोपन्यासः क्रियते— | अब ब्रह्मलोकोंका जो अन्तरतम सूत्र है, उसे बतलाना है, इसीलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। उसे आगम (आचार्योपदेश) के द्वारा ही विचारना चाहिये, इसलिये इतिहासके द्वारा आगमका उपन्यास किया जाता है— |
|---|
सूत्र और अन्तर्यामीके विषयमें प्रश्न
अथ हैनमुद्दालक आरुणिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेष्ववसाम, पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयानास्तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्रवीत् कबन्ध आथर्वण इति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाँश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तत् सूत्रं येनायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि सन्दृब्धानि भवन्तीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तद् भगवन् वेदेति
७४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३
| ७४२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च वेत्थ नु त्वं काप्य तमन्तर्यामिणं य इमं च लोकं परं च लोकꣳ सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयतीति सोऽब्रवीत् पतञ्चलः काप्यो नाहं तं भगवन् वेदेति सोऽब्रवीत् पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकाꣳश्च यो वै तत् काप्य सूत्रं विद्यात्तं चान्तर्यामिणमिति स ब्रह्मवित् स लोकवित् स देववित् स वेदवित् स भूतवित् स आत्मवित् स सर्वविदिति तेभ्योऽब्रवीत्तदहं वेद तच्चेत्त्वं याज्ञवल्क्य सूत्रमविद्वाꣳस्तं चान्तर्यामिणं ब्रह्मगवीरुदजसे मूर्धा ते विपतिष्यतीति वेद वा अहं गौतम तत् सूत्रं तं चान्तर्यामिणमिति यो वा इदं कश्चिद् ब्रूयाद् वेद वेदेति यथा वेत्थ तथा ब्रूहीति ॥ १ ॥
फिर इस याज्ञवल्क्यसे आरुणि उद्दालकने पूछा; वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वद्वारा गृहीत थी। हमने उस (गन्धर्व) से पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मैं आथर्वण कबन्ध हूँ।' उसने कपिगोत्रीय पतञ्चल और उसके याज्ञिकोंसे पूछा, 'काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो जिसके द्वारा यह लोक, परलोक और सारे भूत ग्रथित हैं ?' तब उस काप्य पतञ्चलने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा, 'काप्य ! क्या तुम उस अन्तर्यामीको जानते हो जो इस लोक, परलोक और समस्त भूतोंको भीतरसे नियमित करता हे ?' उस पतञ्चल काप्यने कहा, 'भगवन् ! मैं उसे नहीं जानता।' उसने पतञ्चल काप्य और याज्ञिकोंसे कहा; 'काप्य ! जो कोई उस सूत्र और उस अन्तर्यामीको जानता है, वह ब्रह्मवेत्ता है, वह लोकवेत्ता है, वह देववेत्ता है, वह वेदवेत्ता है, वह भूतवेत्ता है, वह आत्मवेत्ता है और वह सर्ववेत्ता है।'
ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३
ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७४३
तथा इसके पश्चात् गन्धर्वने उन ( काप्य आदि ) से सूत्र और अन्तर्यामीको बताया। उसे मैं जानता हूँ। हे याज्ञवल्क्य ! यदि उस सूत्र और अन्तर्यामीको न जाननेवाले होकर ब्रह्मवेत्ताकी स्वभूत गौओंको ले जाओगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गौतम ! मैं उस सूत्र और अन्तर्यामीको जानता हूँ।' [उद्दालक-] 'ऐसा तो जो कोई भी कह सकता है—'मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ' [ किंतु यों व्यर्थ ढोल पीटनेसे क्या लाभ ? यदि वास्तवमें तुम्हें उसका ज्ञान है तो ] जिस प्रकार तुम जानते हो वह कहो' ॥ १ ॥
| अथ हैनमुद्दालको नामतः, अरुणस्यापत्यमारुणिः पप्रच्छ; याज्ञवल्क्येति होवाच; मद्रेषु देशेष्ववसामोषितवन्तः, पतञ्चलस्य—पतञ्चलो नामतस्तस्यैव कपिगोत्रस्य काप्यस्य गृहेषु यज्ञमधीयाना यज्ञशास्त्राध्ययनं कुर्वाणाः । तस्यासीद् भार्या गन्धर्वगृहीता; तमपृच्छाम—कोऽसीति; सोऽब्रवीत् कबन्धो नामतः, अथर्वणोऽपत्यमाथर्वण इति । | फिर उस याज्ञवल्क्यसे उद्दालक नामसे प्रसिद्ध आरुणि—अरुणके पुत्रने पूछा। वह बोला, 'हे याज्ञवल्क्य ! हम मद्रदेशमें पतञ्चलके—जो नामसे पतञ्चल था उस काप्य-कपिगोत्रीयके घर यज्ञ—यज्ञशास्त्रका अध्ययन करते हुए रहते थे। उसकी भार्या गन्धर्वसे गृहीत थी [अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश था]। उससे हमने पूछा, 'तू कौन है?' उसने कहा, 'मैं नामसे कबन्ध तथा गोत्रतः आथर्वण—अथर्वाका पुत्र हूँ।' |
| सोऽब्रवीद् गन्धर्वः पतञ्चलं काप्यं याज्ञिकांश्च तच्छिष्यान्— वेत्थ नु त्वं हे काप्य जानीषे तत् सूत्रम् ? किं तत् ? येन सूत्रेणायं च लोक इदं च जन्म, परश्च लोकः परं च | उस गन्धर्वने पतञ्चल काप्य और उसके याज्ञिक शिष्योंसे पूछा, 'हे काप्य ! क्या तुम उस सूत्रको जानते हो ? वह कौन ? जिस सूत्रके द्वारा यह लोक — यह जन्म, परलोक— |