भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 78
७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| पार्श्वे उभयदिक्सम्बन्धसामान्यात् । द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमिति पूर्ववत् । इयमुुरः अधोभागसामान्यात् ।<br><br>स एषोऽग्निः प्रजापतिरूपो लोकाद्यात्मकोऽग्निरप्सु प्रतिष्ठितः "एवमिमे लोका अप्स्वन्तः" इति श्रुतेः । यत्र क्व च यस्मिन्कस्मिंश्चिदेति गच्छति तदेव तत्रैव प्रतितिष्ठति स्थितिं लभते । कोऽसौ ? एवं यथोक्तमप्सु प्रतिष्ठितत्वमग्नेर्विद्वान्विजानन् गुणफलमेतत्॥३॥ | होनेमें पार्श्वोंकी समानता है । तथा द्युलोक पीठ और अन्तरिक्ष उदर है—ऐसा पूर्ववत् समझना चाहिये और अधोभागमें समानता होनेके कारण यह (पृथिवी) हृदय है ।<br><br>"इस प्रकार ये लोक जलके भीतर हैं" इस श्रुतिके अनुसार वह यह लोकादि स्वरूप प्रजापतिरूप अग्नि जलमें स्थित है । [ इस उपासनाका फल—] वह जहाँ कहीं—जिस किसी देशमें जाता है तदेव—वहाँ ही [ अर्थात् उसी स्थानपर ] प्रतिष्ठित होता–स्थिति प्राप्त करता है । ऐसा कौन है ? इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे अग्निका जलमें स्थित होना जाननेवाला । यह इस उपासनाका गौण फल है ॥ ३ ॥ |


संवत्सर और वाक्‌की उत्पत्ति

योऽसौ मृत्युः सोऽब्बादिक्रमेणात्मनात्मानम् अण्डस्यान्तः कार्यकरणसंघातवन्तं विराजमग्निमसृजत, त्रेधा चात्मानमकुरुतेत्युक्तम् । स किंवापारः सन्नसृजत ? इत्युच्यते—यह जो मृत्यु था उसने स्वयं ही अपनेको ब्रह्माण्डके अंदर जलादिके क्रमसे कार्यकरणसंघातवान् विराद् अग्निके रूपमें रचा और अपनेको तीन भागोंमें विभक्त किया—यह पहले कहा जा चुका है । उसने क्या व्यापार करते हुए यह रचना की ? सो बतलाया जाता है—

सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनँ समभवदशनाया मृत्युस्तद्यद्रेत

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