बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
आसीत्स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभः । यावान्संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत । तं जातमभिव्याददात्स भाणकरोत्सैव वागभवत् ॥ ४ ॥
उसने कामना की कि मेरा दूसरा शरीर उत्पन्न हो; अतः उस अशनायारूप मृत्युने मनसे वेदरूप मिथुनकी भावना की । उससे जो रेत ( बीज ) हुआ, वह संवत्सर हुआ । इससे पूर्व संवत्सर नहीं था । उस संवत्सरको, जितना संवत्सरका काल होता है, उतने समयतक वह ( मृत्युरूप प्रजापति ) गर्भमें धारण किये रहा । इतने समयके पीछे उसने उसको उत्पन्न किया । उस उत्पन्न हुए कुमारके प्रति मुख फाड़ा । इससे उसने 'भाण्' ऐसा शब्द किया । वही वाक् हुआ ॥ ४ ॥
| स मृत्युरकामयत कामितवान् । किम् ? द्वितीयो मे ममात्मा शरीरं येनाहं शरीरी स्यां स जायेतोत्पद्येत इत्येवमेतदकामयत । स एवं कामयित्वा मनसा पूर्वोत्पन्नेन वाचं त्रयीलक्षणां मिथुनं द्वन्द्वभावं समभवत्सम्भवं कृतवान्मनसा त्रयीमालोचितवान्। त्रयीविहितं सृष्टिक्रमं मनसान्वालोचयदित्यर्थः । कोऽसौ ? अशनायया लक्षितो मृत्युः । अशनाया मृत्यु- | उस मृत्युने कामना की । क्या कामना की ? मेरा दूसरा आत्मा यानी शरीर, जिससे मैं शरीरधारी होऊँ, उत्पन्न हो—इस प्रकार उसने कामना की । इस प्रकार कामना-पर उसने पहले उत्पन्न हुए मनसे वेदत्रयीरूपा वाणीकी मिथुन—द्वन्द्वभावसे भावना की । अर्थात् मनके द्वारा वेदत्रयीकी आलोचना की । वेदत्रयीविहित सृष्टिक्रमका मनसे विचार किया-ऐसा इसका तात्पर्य है। यह कौन था ? अशनाया (क्षुधा) से लक्षित मृत्यु । ‘अशनाया मृत्यु है’ |