बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 801, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९१
'स्तनयित्नु कौन है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अशनि।' [ शाकल्य-] 'यज्ञ कौन है?' [ याज्ञवल्क्य-] 'पशुगण' ॥ ६ ॥
| कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति, स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति, कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति। अशनिर्वज्रं वीर्यं बलम्, यत् प्राणिनः प्रमापयति, स इन्द्रः; इन्द्रस्य हि तत् कर्म। कतमो यज्ञ इति पशव इति—यज्ञस्य हि साधनानि पशवः; यज्ञस्यारूपत्वात् पशुसाधनाश्रयत्वाच्च पशवो यज्ञ इत्युच्यते ॥ ६ ॥ | "इन्द्र कौन है और प्रजापति कौन है।' 'स्तनयित्नु ही इन्द्र है और यज्ञ प्रजापति है।' स्तनयित्नु कौन है?' 'अशनि।' अशनि वज्र-वीर्य अर्थात् बल, जो प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह अशनि इन्द्र है; इन्द्रका ही वह कर्म है। 'यज्ञ कौन है?' 'पशुगण,' क्योंकि पशु यज्ञके साधन हैं; यज्ञ रूपरहित है और पशुरूप साधनके अधीन है इसलिये पशु यज्ञ हैं—ऐसा कहा जाता है ॥ ६ ॥ |
छः देवताओंका विवरण
कतमे षडित्यग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्चैते षडेते हीदँ सर्वं षडिति ॥७॥
[ शाकल्य-] 'छः देवगण कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य और द्युलोक—ये छः देवगण हैं। ये वसु आदि तैंतीस देवताओंके रूपमें अग्नि आदि छः ही हैं' ॥ ७ ॥
| कतमे षडिति; त एवाग्न्यादयो वसुत्वेन पठिताश्चन्द्रमसं नक्षत्राणि च वर्जयित्वा षड भवन्ति—षट्संख्याविशिष्टाः। एते हि यस्मात्, त्रयस्त्रिंशदादि यदुक्तमिदं सर्वम्, एत एव षड् भवन्ति। | 'छः देवगण कौन हैं?' 'वे वसु रूपसे पढ़े हुए अग्नि आदि ही चन्द्रमा और नक्षत्रोंको छोड़कर छः अर्थात् षट्संख्याविशिष्ट होते हैं, क्योंकि ये तैंतीस आदि बतलाये हुए समस्त देवगण ये छः ही होते |