भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 802
७९२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
सर्वो हि वस्त्रादिविस्तर एतेष्वेव षट्स्वन्तर्भवतीत्यर्थः ॥ ७ ॥हैं। तात्पर्य यह है कि यह वसु आदि सम्पूर्ण देवताओंका विस्तार इन छःमें ही अन्तर्भूत हो जाता है ॥ ७ ॥

देवताओंकी तीन, दो और डेढ़ संख्याओंका विवरण

कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति कतमौ तौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति कतमोऽध्यर्ध इति योऽयं पवत इति ॥८॥

[ शाकल्य—] 'वे तीन देव कौन हैं ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। इन्हींमें ये सब देव अन्तर्भूत हैं। [ शाकल्य—] 'वे दो देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'अन्न और प्राण ।' [ शाकल्य—] 'डेढ़ देव कौन हैं?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो यह बहता है' ॥ ८ ॥

कतमे ते त्रयो देवा इति; इम एव त्रयो लोका इति— पृथिवीमग्निं चैकीकृत्यैको देवः, अन्तरिक्षं वायुं चैकीकृत्य द्वितीयः, दिवमादित्यं चैकीकृत्य तृतीयः—ते एव त्रयो देवा इति । एषु, हि यस्मात्, त्रिषु देवेषु सर्वे देवा अन्तर्भवन्ति तेन त एव देवास्त्रयः—इत्येष नैरुक्तानां केषाञ्चित् पक्षः । कतमौ तौ द्वौ देवाविति—अन्नं चैव'वे तीन देव कौन हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'ये तीन लोक ही तीन देव हैं। पृथिवी और अग्नि मिलाकर एक देव हैं, अन्तरिक्ष और वायु मिलाकर दूसरे देव हैं तथा द्युलोक और आदित्य मिलाकर तीसरे देव हैं। 'ते एव त्रयो देवाः' इति—क्योंकि इन तीन देवोंमें ही समस्त देवोंका अन्तर्भाव होता है, इसलिये ये ही तीन देव हैं—ऐसा किन्हीं निरुक्तवेत्ताओंका पक्ष है ।¹ 'वे दो देव कौन हैं ?' 'अन्न और प्राण—

१. तात्पर्य यह है कि कुछ ही लोगोंका ऐसा मत है, दूसरे लोग 'त्रयो लोकाः' इस पदसे 'भूः, भुवः, स्वः' इन नामोंसे प्रसिद्ध तीन लोक ही ग्रहण करते हैं।