भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 803, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 803

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७९३


प्राणश्चैतौ द्वौ देवौ, अनयोः सर्वेषामुक्तानामन्तर्भावः। कतमोऽध्यर्ध इति—योऽयं पवते वायुः ॥ ८ ॥ये दो देव हैं, इन्हींमें पूर्वोक्त सभी देवताओंका अन्तर्भाव हो जाता है।' 'डेढ़ देव कौन हैं?' 'जो यह बहता है, वह वायु डेढ़ देव है' ॥८॥

डेढ़ और एक देवका विवरण

तदाहुर्यदयमेक इवैव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति यस्मिन्निदँ सर्वमध्याध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति प्राण इति स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते ॥६॥

यहां ऐसा कहते हैं—'यह जो वायु है, एकही-सा बहता है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ़ किस प्रकार है?' [ उत्तर— ] 'क्योंकि इसीमें यह सब ऋद्धिको प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यर्ध ( डेढ़ ) है।' [ शाकल्य— ] 'एक देव कौन है?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'प्राण, वह ब्रह्म है, उसीको 'त्यत्' ऐसा कहते हैं' ॥ ६ ॥

तत्तत्राहुश्चोदयन्ति—यदयं वायुरेक इवैव एक एव पवते; अथ कथमध्यर्ध इति ? यदस्मिन्निदं सर्वमध्याध्नोत्—अस्मिन् वायौ सतीदं सर्वमध्याध्नोत्—अधिऋद्धिं प्राप्नोति, तेनाध्यर्ध इति ।<br><br>कतम एको देव इति ? प्राण इति स प्राणो ब्रह्म—सर्वदेवात्मकत्वान्महद् ब्रह्म, तेन स ब्रह्म त्य-इस विषयमें कोई ऐसा प्रश्न करते हैं—'यह जो वायु है 'एक इव'—एक-सा ही चलता है, फिर यह अध्यर्ध—डेढ़ क्यों है?' [उत्तर—] 'क्योंकि इसीमें यह सब 'अध्याध्नोत् (अधिऋद्धिं प्राप्नोत्)' अर्थात् इस वायुके रहते ही यह सब अधिऋद्धि-को प्राप्त होता है, इसलिये यह अध्यर्ध है।'<br><br>'एक देव कौन है?' 'प्राण' वह प्राण ब्रह्म है, सर्वदेवरूप होनेके कारण वह महद् ब्रह्म है; इसलिये