भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 804, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 804
७९४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| दित्याचक्षते—त्यदिति तद् ब्रह्म—चक्षते परोक्षाभिधायकेन शब्देन। <br> देवानाममेतदेकत्वं नानात्वं च। अनन्तानां देवानां निवित्संख्याविशिष्टेष्वन्तर्भावः, तेषामपि त्रयस्त्रिंशदादिषूत्तरोत्तरेषु यावदेकस्मिन् प्राणे। प्राणस्यैव चैकस्य सर्वोऽनन्तसङ्ख्यातो विस्तरः। एवमेकश्चानन्तश्च अवान्तरसंख्याविशिष्टश्च प्राण एव। तत्र च देवस्यैकस्य नामरूपकर्मगुणशक्तिभेदः, अधिकारभेदात् ॥ ९ ॥ | वह ब्रह्म 'त्यत्' है—ऐसा कहते हैं। अर्थात् उस ब्रह्मको 'त्यत्' इस परोक्षवाचक शब्दसे कहते हैं। <br> यही देवताओंका एकत्व और नानात्व है। अनन्त देवोंका निवित्संख्याविशिष्ट देवोंमें अन्तर्भाव है, और उनका भी तैंतीस आदि उत्तरोत्तर देवोंमें यहां तक कि अकेले प्राणमें ही अन्तर्भाव है। एक प्राणका ही यह सब अनन्त-संख्याके रूपमें विस्तार हुआ है। इस प्रकार एक, अनन्त तथा अन्यान्य संख्याओंसे विशिष्ट एक प्राण ही है। वहाँ अधिकारभेदसे एक ही देवके नाम, रूप, कर्म, गुण और शक्तिका भेद है ॥ ६ ॥ |

प्राणब्रह्मके आठ प्रकारके भेद

इदानीं तस्यैव प्राणस्य ब्रह्मणः पुनरष्टधा भेद उपदिश्यते—अब उस प्राणब्रह्मके ही आठ प्रकारके भेद बतलाये जाते हैं—

पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणग्ँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषग्ँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायग्ँ शारीरः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यमृतमिति होवाच ॥ १० ॥

[ शाकल्य- ] 'पृथिवी ही जिसका आयतन है तथा अग्नि लोक ( दर्शनशक्ति ) और मन ज्योति ( संकल्प-विकल्पका साधन ) है, जो भी

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