बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 805, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 805
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७९५
उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता (पण्डित) है। याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] ।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिसे तुम सम्पूर्ण आध्यात्मिक कार्यकारणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। यह जो शारीर पुरुष है, वही यह है। शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'अच्छा, उसका देवता कौन है?' तब याज्ञवल्क्यने 'अमृत' ऐसा कहा ॥ १० ॥
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| पृथिव्येव यस्य देवस्यायतनमाश्रयः, अग्निर्लोको यस्य—लोकयत्यनेनेति लोकः, पश्यतीति—अग्निना पश्यतीत्यर्थः। मनोज्योतिः मनसा ज्योतिषा संकल्पविकल्पादिकार्यं करोति यः, सोऽयं मनोज्योतिः । पृथिवीशरीरोऽग्निदर्शनो मनसा संकल्पयिता पृथिव्यभिमानी कार्यकरणसंघातवान् देव इत्यर्थः । | जिस देवका पृथिवी ही आयतन अर्थात् आश्रय है, अग्नि जिसका लोक है—इसके द्वारा अवलोकन करता है, इसलिये यह इसका लोक है, 'लोकयति' का अर्थ है—देखता है अर्थात् वह अग्निसे देखता है। तथा मनोज्योति है—जो मनरूप ज्योतिसे संकल्प-विकल्पादि कार्य करता है, वह यह देव मनोज्योति है। तात्पर्य यह है कि यह पृथिवीका अभिमानी कार्यकारणसंघातवान् देव पृथिवीरूप शरीरवाला, अग्निरूप दर्शनशक्तिवाला और मनसे संकल्प करनेवाला है। |
| य एवं विशिष्टं वै तं पुरुषं विद्याद् विजानीयात् सर्वस्यात्मन आध्यात्मिकस्य कार्यकारणसंघातस्य आत्मनः परमयनं पर आश्रयस्तं परायणम् । मातृजेन त्वङ्मांसरुधिररूपेण क्षेत्रस्थानीयेन बीजस्थानीयस्य पितृजस्य अस्थि- | जो ऐसे लक्षणोंसे युक्त उस पुरुषको सम्पूर्ण आत्माका—आध्यात्मिक कार्य-करणसंघातरूप आत्माका परम अयन यानी परम आश्रय जानता है अर्थात् मातृजनित क्षेत्रस्थानीय त्वचा, मांस और रुधिररूपसे पितृजनित बीजस्थानीय अस्थि-मज्जा और |