भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 809

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ७९९

पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो!]’ [याज्ञवल्क्य-] ‘तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह आदित्यमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य! और बोलो।’ [शाकल्य-] ‘उसका देवता कौन है?’ तब याज्ञवल्क्यने ‘सत्य’ ऐसा कहा ॥ १२ ॥

| रूपाण्येव यस्यायतनम् । रूपाणि शुक्लकृष्णादीनि । य एवासावादित्ये पुरुषः—सर्वेषां हि रूपाणां विशिष्टं कार्यमादित्ये पुरुषः। तस्य का देवतेति ? सत्यमिति होवाच । सत्यमिति चक्षुरुच्यते, चक्षुषो ह्यध्यात्मतः आदित्यस्याधिदैवतस्य निष्पत्तिः ॥ १२ ॥ | रूप ही जिसका आयतन हैं। रूप हैं शुक्ल-कृष्ण आदि। जो भी यह आदित्यमें पुरुष है—सम्पूर्ण रूपोंका जो विशिष्ट कार्य है वही आदित्यमें पुरुष है। उसका देवता कौन है? तब याज्ञवल्क्यने ‘सत्य’ ऐसा कहा। सत्य-इस शब्दसे चक्षु कहा गया है, क्योंकि अध्यात्म-चक्षु-से ही अधिदैवत आदित्यकी निष्पत्ति होती है ॥ १२ ॥ |

आकाश एव यस्यायतनँ श्रोत्रं लोको मनो- ज्योतियों वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायँ श्रोत्रः प्रातिश्रुत्कः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति दिश इति होवाच ॥ १३ ॥

[शाकल्य-] ‘आकाश ही जिसका आयतन है, श्रोत्र लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य! [तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो!]’ [याज्ञवल्क्य-] ‘तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण कहते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क पुरुष है, यही वह है, हे शाकल्य!