बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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और बोलो।' [ शाकल्य-] 'उसका कौन देवता है?' तब याज्ञवल्क्यने 'दिशाएँ' ऐसा कहा ॥ १३ ॥
| आकाश एव यस्यायतनम् य एवायं श्रोत्रे भवः श्रौत्रः, तत्रापि प्रतिश्रवणवेलायां विशेषतो भवतीति प्रातिश्रुत्कः, तस्य का देवतेति ? दिश इति होवाच । दिग्भ्यो ह्यसावाध्यात्मिको निष्पद्यते ॥ १३ ॥ | आकाश ही जिसका आयतन है। जो भी यह श्रोत्रमें रहनेवाला श्रोत्र और उसमें भी जो प्रतिश्रवणके समय विशेषरूपसे रहता है, वह प्रातिश्रुतक हे, उसका देवता कौन है ? इसपर [याज्ञवल्क्यने] कहा, 'दिशाएँ' क्योंकि दिशाओंसे ही यह आध्यात्मिक पुरुष निष्पन्न होता है ॥ १३ ॥ |
तम एव यस्यायतनꣳ हृदयं लोको मनो-
ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणꣳ
स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣳ
सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं छायामयः
पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति
मृत्युरिति होवाच ॥ १४ ॥
[ शाकल्य–] 'तम ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है, मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण जानता है, वही ज्ञाता है, याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो !]।' [ याज्ञवल्क्य–] 'तुम जिसे समस्त आध्यात्मिक कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह छायामय पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य–] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'मृत्यु' ऐसा कहा ॥ १४ ॥
| तम एव यस्यायतनम् । तम इति शार्वराद्यन्धकारः परिगृह्यते । | तम ही जिसका आयतन है। 'तम' शब्दसे रात्रि आदिका अन्धकार |