बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 811, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८०१
| अध्यात्मं छायामयोऽज्ञानमयः पुरुषः । तस्य का देवतेति ? मृत्युरिति होवाच । मृत्युरधिदैवतं तस्य निष्पत्तिकारणम् ॥ १४ ॥ | ग्रहण किया जाता है । अध्यात्मपक्षमें छायामय—अज्ञानमय पुरुष ही तम है । उसका कौन देवता है । 'मृत्यु' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । अधिदैवत मृत्यु¹ ही उस ( छायामय पुरुष ) की निष्पत्तिका कारण है ॥ १४ ॥ |
रूपाण्येव यस्यायतनं चक्षुर्लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमादर्शे पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेत्यसुरिति होवाच ॥ १५॥
[ शाकल्य—] 'रूप ही जिसका आयतन है, नेत्र लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है । हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही पण्डित होनेका अभिमान कर रहे हो ! ] १' [ याज्ञवल्क्य—] 'तुम जिसे सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ । जो भी यह आदर्श ( दर्पण ) के भीतर पुरुष है, वही यह है । हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका देवता कौन है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'असु' ऐसा कहा ॥ १५ ॥
| रूपाण्येव यस्यायतनम् । पूर्वं साधारणानि रूपाण्युक्तानि, इह तु | रूप ही जिसका आयतन है । पहले साधारण रूप कहे गये हैं, |
१. 'मृत्यु' शब्दसे यहाँ ईश्वर ( अव्याकृत ) समझना चाहिये, जैसा कि यह श्रुति कहती है—'मृत्युनैवेदमावृतमासीत्' अर्थात् पहले यह मृत्युसे ही व्याप्त था । अविवेककी प्रवृत्ति ईश्वरके ही अधीन है, इसलिये वह अज्ञानमय आध्यात्मिक पुरुषकी उत्पत्तिका कारण है ।
बृ० उ० — ५१