भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 812, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 812
८०२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| प्रकाशकानि विशिष्टानि रूपाणि गृह्यन्ते। रूपायतनस्य देवस्य विशेषाsubयतनं प्रतिबिम्बाधारमादर्शादि तस्य का देवतेति ? असुरिति होवाच। तस्य प्रतिबिम्बाख्यस्य पुरुषस्य निष्पत्तिरसोः प्राणात् ॥ १५ ॥ | किंतु यहाँ प्रकाश करनेवाले विशिष्ट रूप ग्रहण किये जाते हैं। रूप जिसका आयतन (आश्रय) है, उस देवका विशेष आयतन प्रतिबिम्बके आधारभूत आदर्शादि हैं। उसका कौन देवता है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा 'असु' ( प्राण ) । अर्थात् उस प्रतिबिम्ब-संज्ञक पुरुषकी निष्पत्ति असु¹—प्राणसे होती है ॥ १५ ॥ |


आप एव यस्यायतनँ हृदयं लोको मनो-ज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणँ स वै वेदिता स्यात्। याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषँ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायमप्सु पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति वरुण इति होवाच ॥ १६ ॥

[ शाकल्य—] 'जल ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, उस पुरुषको जो भी सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]।' [ याज्ञवल्क्य—] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसमूहका परायण बतलाते हो उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह जलमें पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य—] 'उसका कौन देवता है!' तब याज्ञवल्क्यने 'वरुण' ऐसा कहा ॥ १६ ॥


१. प्राणद्वारा घर्षण करनेपर ही आदर्शादि प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके योग्य होते हैं; इसलिये असुको प्रतिबिम्बसंज्ञक पुरुषकी निष्पत्तिका कारण बतलाना उचित ही है।