भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 813, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 813

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०३


| आप एव यस्य आयतनम् । साधारणाः सर्वा आप आयतनम्; वापीकूपतडागाद्याश्रयास्वप्सु विशेषावस्थानम् । तस्य का देवतेति ? वरुण इति; वरुणात् सङ्घातकर्योऽध्यात्ममाप एव वाप्याद्यपां निष्पत्तिकारणम् ॥ १६ ॥ | जल ही जिसका आयतन है। सभी साधारण जल जिसका आयतन हैं; वापी, कूप और तडागादिमें रहनेवाले जलमें जिसकी विशेष स्थिति है। उसका देवता कौन है ? इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'वरुण'; क्योंकि वरुणके द्वारा संघात करनेवाला अध्यात्म जल ही वापी आदिके जलकी निष्पत्तिका कारण है¹॥ १६ ॥ |

रेत एव यस्यायतनꣳ हृदयं लोको मनोज्योतिर्यो वै तं पुरुषं विद्यात् सर्वस्यात्मनः परायणꣳ स वै वेदिता स्यात् । याज्ञवल्क्य वेद वा अहं तं पुरुषꣳ सर्वस्यात्मनः परायणं यमात्थ य एवायं पुत्रमयः पुरुषः स एष वदैव शाकल्य तस्य का देवतेति प्रजापतिरिति होवाच ॥ १७ ॥

[ शाकल्य— ] 'वीर्य ही जिसका आयतन है, हृदय लोक है और मन ज्योति है, जो भी उस पुरुषको सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करणसंघातका परायण जानता है, वही ज्ञाता है। हे याज्ञवल्क्य ! [ तुम तो बिना जाने ही विद्वान् होनेका अभिमान कर रहे हो ! ]' [ याज्ञवल्क्य— ] 'जिसे तुम सम्पूर्ण अध्यात्म कार्य-करण-संघातका परायण बतलाते हो, उस पुरुषको तो मैं जानता हूँ। जो भी यह पुत्ररूप पुरुष है, वही यह है। हे शाकल्य ! और बोलो।' [ शाकल्य— ] 'उसका कौन देवता है ?' तब याज्ञवल्क्यने 'प्रजापति' ऐसा कहा ॥ १७ ॥


१. वापी एवं कूपादिसे पिया हुआ जल जो शरीरमें मूत्रादि संघातको करता है वह वरुणसे ही होता है। रश्मियोंद्वारा पृथिवीपर गिरा हुआ जल 'वरुण' शब्दसे कहा जाता है; क्योंकि वह सूर्यकिरणोंसे पृथिवीपर गिरनेवाला जल ही पिये जानेवाले वापी-कूपादिके जलकी उत्पत्तिका कारण है, इसलिये वह जलमय अध्यात्म पुरुषका भी कारण है।