भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 824, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 824
८१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३ ]
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
किन्देवतोऽस्यामुदीच्यां दिश्यसीति ? सोमदेवत इति—सोम इति लतां सोमं देवतां चैकीकृत्य निर्देशः। स सोमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? दीक्षायामिति—दीक्षितो हि यजमानः सोमं क्रीणाति, क्रीतेन सोमेनेष्ट्वा ज्ञानवानुत्तरां दिशं प्रतिपद्यते सोमदेवताधिष्ठितां सौम्याम्।'इस उत्तर दिशामें तुम कौन देवतावाले हो ?' 'सोमदेवतावाला हूँ'—'सोम' इस शब्दसे सोमलता और सोमदेवताको एक मानकर निर्देश किया गया है। 'वह सोम किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'दीक्षामें'—क्योंकि दीक्षित यजमान ही सोमको खरीदता है और खरीदे हुए सोमसे यजन करके वह ज्ञानवान् सोमदेवतासे अधिष्ठित सोमसम्बन्धिनी उत्तर दिशाको प्राप्त होता है।
कस्मिन्नु दीक्षा प्रतिष्ठितेति ! सत्य इति; कथम् ? यस्मात् सत्ये दीक्षा प्रतिष्ठिता, तस्मादपि दीक्षितमाहुः—सत्यं वदेति; कारणभ्रेषे कार्यभ्रेषो मा भूदिति; सत्ये ह्येव दीक्षा प्रतिष्ठितेति।'दीक्षा किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'सत्यमें,; किस प्रकार ? क्योंकि दीक्षा सत्यमें प्रतिष्ठित है, इसीसे दीक्षित पुरुषसे कहते हैं कि 'सत्य बोलो' जिससे कि [ सत्यरूप ] कारणका नाश होनेसे [ दीक्षारूप ] कार्यका नाश न हो; अतः सत्यमें ही दीक्षा प्रतिष्ठित है।
कस्मिन्नु सत्यं प्रतिष्ठितमिति ? हृदय इति होवाच; हृदयेन हि सत्यं जानाति; तस्माद् हृदये ह्येव सत्यं प्रतिष्ठितं भवतीति। एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥२३॥'सत्य किसमें प्रतिष्ठित है ?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमें; क्योंकि हृदयसे ही सत्यको जानता है; इसलिये सत्य हृदयमें ही प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २३ ॥