बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 825, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 825
ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१५
देवता और प्रतिष्ठाके सहित ध्रुवा दिशाका वर्णन
किन्देवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीत्यग्निदेवत इति सोऽग्निः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति वाचीति कस्मिन्नु वाक् प्रतिष्ठितेति हृदय इति कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥
'इस ध्रुवा दिशामें तुम कौन देवतावाले हो?' [याज्ञवल्क्य—] 'अग्निदेवतावाला हूँ' [शाकल्य—] 'वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य—] 'वाक्में।' [शाकल्य—] 'वाक् किसमें प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य—] 'हृदयमें।' [शाकल्य—] 'हृदय किसमें प्रतिष्ठित है?' ॥ २४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किन्देवतोऽस्यां ध्रुवायां दिश्यसीति । मेरोः समन्ततो वसतामव्यभिचारादूर्ध्वा दिग् ध्रुवेत्युच्यते । अग्निदेवत इति—ऊर्ध्वायां हि प्रकाशभूयस्त्वम्, प्रकाशश्चाग्निः । सोऽग्निः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? वाचीति । कस्मिन्नु वाक् प्रतिष्ठितेति ? हृदय इति । | 'इस ध्रुवा दिशामें तुम कौन देवतावाले हो?' मेरुके चारों ओर निवास करनेवाले लोगोंकी दृष्टिसे ऊर्ध्व दिशाका कभी व्यभिचार नहीं होता, इसलिये वह ध्रुवा कही जाती है। [याज्ञवल्क्य—] 'मैं अग्नि देवतावाला हूँ।' क्योंकि ऊर्ध्व-दिशामें प्रकाशकी बहुलता है और प्रकाश ही अग्नि है। 'वह अग्नि किसमें प्रतिष्ठित है?' 'वाक्में।' 'और वाक् किसमें प्रतिष्ठित है?' 'हृदयमें।' |
| तत्र याज्ञवल्क्यः सर्वासु दिक्षु विप्रस्रुतेन हृदयेन सर्वा दिश आत्मत्वेनाभिसम्पन्नः; सदेवाः सप्रतिष्ठा दिश आत्मभूतास्तस्य नामरूपकर्मात्मभूतस्य याज्ञवल्क्य- | उस समय समस्त दिशाओंमें फैले हुए हृदयके द्वारा याज्ञवल्क्य सम्पूर्ण दिशाओंको आत्मभावसे प्राप्त था; अर्थात् नामरूप और कर्मके स्वरूप-भूत उस याज्ञवल्क्यकी देवता और प्रतिष्ठाके सहित सम्पूर्ण दिशाएँ |