भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 826, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 826
८१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| स्य। यद् रूपं तत् प्राच्या दिशा सह हृदयभूतं याज्ञवल्क्यस्य। यत् केवलं कर्म पुत्रोत्पादनलक्षणं च ज्ञानसहितं च सहफलेनाधिष्ठात्रीभिश्च देवताभिर्दक्षिणाप्रतीच्युदीच्यः कर्मफलात्मिका हृदयमेव आपन्नास्तस्य, ध्रुवया दिशा सह नाम सर्वं वाग्द्वारेण हृदयमेव आपन्नम्।<br><br>एतावद्धीदं सर्वम्, यदुत रूपं वा कर्म वा नाम वेति तत् सर्वं हृदयमेव, तत् सर्वात्मकं हृदयं पृच्छ्यते—कस्मिन्नु हृदयं प्रतिष्ठितमिति ॥ २४ ॥ | आत्मभूत थीं। जो रूप था, वह पूर्व-दिशाके सहित याज्ञवल्क्यका हृदय-स्वरूप हो गया था। तथा जो केवल कर्म, पुत्रोत्पादनरूप कर्म और ज्ञानसहित कर्म थे वे अपने फल और अधिष्ठातृदेवोंके सहित कर्मफलरूप दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओंके साथ उसका हृदय ही हो गये थे। तथा ध्रुवा दिशाके सहित सम्पूर्ण नाम भी वाक्‌के द्वारा उसके हृदयको ही प्राप्त हो गये थे।<br><br>जो कुछ रूप, कर्म अथवा नाम है, वह सब इतना ही है और वह सब हृदय ही है; उस सर्वात्मक हृदयके विषयमें प्रश्न किया जाता है—'हृदय किसमें प्रतिष्ठित है ?' ॥ २४ ॥ |


हृदय और शरीरका अन्योन्याश्रयत्व

अहल्लिकेति होवाच याज्ञवल्क्यो यत्रैतदन्यत्रास्मन्मन्यासै यद्ध्येतदन्यत्रास्मत्स्याच्छ्वानो वैनद्युर्वयाँसि वैनद्विमथ्नीरन्निति ॥ २५ ॥

याज्ञवल्क्यने 'अहल्लिक ! (प्रेत !)^१' ऐसा सम्बोधन करके कहा—'जिस समय तुम इसे अलग मानते हो, उस समय यदि यह हमसे अलग हो जाय तो इसे कुत्ते खा जायँ, अथवा इसे पक्षी चोंच मारकर मथ डालें ॥ २५ ॥

अहल्लिकेति होवाच याज्ञ-याज्ञवल्क्यने 'अहल्लिक' ऐसा कहा।

१. 'अहनि लीयते इति अहल्लिकः' जो दिनमें लीन हो जाता है वह अहल्लिक अर्थात् प्रेत है।