बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 831, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१९
| प्रागेव प्रेयात् अपानवृत्त्या चेन्न निगृह्येत। कस्मिन्नपानः प्रतिष्ठित इति ? व्यान इति—साप्यपानवृत्तिरध एव यायात् प्राणवृत्तिश्च प्रागेव, मध्यस्थया चेद्व्यानवृत्त्या न निगृह्येत। कस्मिन्नु व्यानः प्रतिष्ठित इति ? उदान इति—सर्वास्तिस्रोऽपि वृत्तय उदाने कीलस्थानीये चेन्न निबद्धा, विष्वग्गवेयुः। कस्मिन्नूदानः प्रतिष्ठित इति ? समान इति—समानप्रतिष्ठा ह्येताः सर्वा वृत्तयः। | अपानवृत्तिद्वारा रोकी न जाय तो वह ऊपर-ही-ऊपर बाहर निकल जाय।' 'अपान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'व्यानमें,—क्योंकि यदि मध्यवर्तिनी व्यानवृत्तिसे न रोकी जाय तो अपानवृत्ति नीचेको ही चली जाय और प्राणवृत्ति ऊपरको ही निकल जाय।' 'व्यान किसमें प्रतिष्ठित है?' 'उदानमें,—यदि ये तीनों वृत्तियाँ कीलस्थानीय उदानवृत्तिमें बँधी न हों तो सब ओर ही चली जायँ।' 'उदान किसमें प्रतिष्ठित है?' समानमें,—ये सब वृत्तियाँ समानमें ही प्रतिष्ठित हैं।' |
| एतदुक्तं भवति—शरीरहृदयवायवोऽन्योन्यप्रतिष्ठाः, सङ्घातेन नियता वर्तन्ते विज्ञानमयार्थप्रयुक्ता इति। सर्वमेतद् येन नियतं यस्मिन् प्रतिष्ठितमाकाशान्तमोतं च प्रोतं च, तस्य निरुपाधिकस्य साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्मणो निर्देशः कर्तव्य इत्ययमारम्भः। | यहां कहा यह गया है कि शरीर, हृदय और प्राण—ये परस्पर प्रतिष्ठित हैं और विज्ञानमयके लिये प्रयुक्त होकर सङ्घातरूपसे नियमपूर्वक प्रवृत्त होते हैं। यह सब जिसके द्वारा नियत है, जिसमें प्रतिष्ठित है और जिसमें यह आकाशपर्यन्त ओतप्रोत है, उस निरुपाधिक साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्मका निर्देश करना है, इसीसे यह आगे आरम्भ किया जाता है। |
| स एषः— स यो नेति नेतीति निर्दिष्टो मधुकाण्डे, एष सः। सोऽयमात्मागृह्यो न गृह्यः। | स एषः— वह, जिसका कि मधुकाण्डमें 'नेति-नेति' इस प्रकार निर्देश किया गया है, यह है। वह यह आत्मा अगृह्य है, ग्रहण करने |