बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 832, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८२० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| कथम् ? यस्मात् सर्वकार्यधर्मातीतः, तस्मादगृह्यः । कुतः ? यस्मान्न हि गृह्यते । यद्धि करणगोचरं व्याकृतं वस्तु, तद् ग्रहणगोचरम्; इदं तु तद्विपरीतमात्मतत्त्वम् । | योग्य नहीं है, किस प्रकार ? क्योंकि यह समस्त कार्यधर्मोंसे अतीत है, इसलिये अगृह्य है । क्यों अगृह्य है ? क्योंकि यह ग्रहण नहीं किया जा सकता । जो व्याकृत वस्तु इन्द्रियका विषय होती है, वही ग्रहणका विषय होती है, किंतु यह आत्मतत्त्व तो उससे विपरीत है । | | तथाशीर्यः; यद्धि मूर्तं संहतं शरीरादि तच्छीर्यते; अयं तु तद्विपरीतोऽतो न हि शीर्यते । | इसी प्रकार यह अशीर्य है; जो मूर्त और संहत शरीरादि हैं, वे ही शीर्ण होते हैं; यह उससे विपरीत है, इसलिये यह शीर्ण (नष्ट) नहीं होता । तथा यह असङ्ग है । | | तथासङ्गो मूर्तो मूर्तान्तरेण सम्बध्यमानः सज्यतेऽयं च तद्विपरीतोऽतो न हि सज्यते । तथा- | मूर्त पदार्थ ही किसी दूसरे मूर्त पदार्थसे सम्बद्ध होनेपर उसमें संसक्त होता है, यह उससे विपरीत स्वभाववाला है, इसलिये कहीं संसक्त नहीं होता । तथा यह असित–अबद्ध है, | | सितोऽबद्धः, यद्धि मूर्तं तद् बध्यते; अयं तु तद्विपरीतत्वादबद्धत्वान्न व्यथते, अतो न रिष्यति—ग्रहणविशरणसम्बन्धकार्यधर्मरहितत्वान्न रिष्यति न हिंसामापद्यते न विनश्यतीत्यर्थः । | क्योंकि जो पदार्थ मूर्त होता है, वही बँधता है; किंतु यह उससे विपरीत (अमूर्त) और अबद्ध होनेके कारण व्यथित नहीं होता और इसीसे रिष (हिंसा) को नहीं प्राप्त होता है—ग्रहण, विशरण, सम्बन्ध आदि कार्य धर्मोंसे रहित होनेके कारण यह रिष अर्थात् हिंसाको नहीं प्राप्त होता; भाव यह कि वह कभी नष्ट नहीं होता । |