बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 833, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२१
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| क्रममतिक्रम्य औपनिषदस्य पुरुषस्य आख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुत्या स्वेन रूपेण त्वरया निर्देशः कृतः; ततः पुनराख्यायिकामेवाश्रित्याह—एतानि यान्युक्तान्यष्टावायतनानि 'पृथिव्येव यस्यायतनम्' इत्येवमादीनि, अष्टौ लोका अग्निलोकादयः, अष्टौ देवाः 'अमृतमिति होवाच' इत्येवमादयः; अष्टौ पुरुषाः शारीरः पुरुषः, इत्यादयः; स यः कश्चित् तान् पुरुषान्-शारीरप्रभृतीन् निरुह्य निश्चयेनोह्य गमयित्वाष्टचतुष्कभेदेन लोकस्थितिम उपपाद्य, पुनः प्राचीदिगादिद्वारेण प्रत्युह्य उपसंहृत्य स्वात्मनि हृदयेऽत्यक्रामदतिक्रान्तवानुपाधिधर्मं हृदयाद्यात्मत्वम्; स्वेनैवात्मना व्यवस्थितो य औपनिषदः पुरुषोऽशनायादिवर्जितः उपनिषत्स्वेव विज्ञेयो नान्यप्रमाणगम्यः, तं त्वा त्वां विद्याभिमानिनं पुरुषं पृच्छामि । तं चेद् यदि | यहाँ श्रुतिने उतावलीके कारण क्रमको छोड़कर आख्यायिकासे हटकर औपनिषद पुरुषका स्वरूपतः निर्देश कर दिया है; इसलिये अब फिर आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है—'ये जो 'पृथिव्येव यस्यायतनम्' इत्यादि प्रकारसे वर्णित आठ आयतन, 'अग्निलोक' आदि आठ लोक, 'अमृतमिति होवाच' इत्यादि प्रकारसे कहे हुए आठ देव तथा 'शारीर पुरुष' आदि आठ पुरुष बतलाये गये हैं; जो कोई इन शारीरप्रभृति आठ पुरुषोंको निरुह्य-निश्चयपूर्वक ऊहा करके अर्थात् इनका ज्ञान प्राप्त कराकर आयतन, लोक, देव और पुरुषरूप चार भेदोंके समुदायके क्रमसे आठ विभागोंद्वारा लोकस्थितिके अनुकूल विस्तारपूर्वक उपपादन कर फिर प्राची दिगादिके द्वारा उन्हें स्वात्मामें-अपने हृदयमें प्रत्युह्य अर्थात् उपसंहृत कर उपाधिधर्म हृदयादिरूपताका अतिक्रमण किये हुए है तथा जो क्षुधादिधर्मरहित औपनिषद पुरुष अपने ही स्वरूपसे स्थित और उपनिषदोंमें ही विज्ञेय है, किसी अन्य प्रमाणसे नहीं जाना जा सकता, उस पुरुषके विषयमें मैं विद्याका अभिमान रखनेवाले तुमसे प्रश्न करता हूँ, यदि तुम मेरे प्रति उसका विवि- |