भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 834, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 834
८२२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
मे न विवक्ष्यसि विस्पष्टं न कथयिष्यसि, मूर्धा ते विपतिष्यतीत्याह याज्ञवल्क्यः।ख्यान—विशेष स्पष्टरूपसे निरूपण नहीं करोगे तो तुम्हारा मस्तक गिर जायगा'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा।
तं त्वौपनिषदं पुरुषं शाकल्यो न मेने ह न विज्ञातवान् किल तस्य ह मूर्धा विपपात विपातितः। समाप्ताख्यायिका। श्रुतेर्वचनं तं ह न मेन इत्यादि। किं चापि हास्य परिमोषिणस्तस्करा अस्थीन्यपि संस्कारार्थं शिष्यैर्नीयमानानि गृहान् प्रत्यपजह्रुः—अपहृतवन्तः किन्निमित्तम् ? अन्यद् धनं नीयमानं मन्यमानाः।उस औपनिषद पुरुषको शाकल्य नहीं जानता था—उसे उसका स्पष्ट ज्ञान नहीं था; अतः उसका मस्तक विपपात अर्थात् गिर गया। बस, आख्यायिका समाप्त हो गयी। 'तं ह न मेने' इत्यादि श्रुतिके वचन हैं। यही नहीं, उसके शिष्यगण जो उसकी अस्थियोंको संस्कारके लिये घरकी ओर ले जा रहे थे, उन्हें परिमोषी—लुटेरोंने छीन लिया। क्यों ? उन्हें ले जाये जाते हुए कोई अन्य धन समझकर।
पूर्ववृत्ताह्याख्यायिकेह सूचिता। अष्टाध्याय्यां<sup></sup> किल शाकल्येन याज्ञवल्क्यस्य समानान्त एव किल संवादो निवृत्तः; तत्र याज्ञवल्क्येन शापो दत्तः—पुरेऽतिथ्ये मरिष्यसि न तेऽस्थीनि च न गृहान् प्राप्स्यन्तीति। स ह तथैव ममार। तस्य हाप्यन्यन्मन्यमानाः परिमोषिणोऽस्थीन्यपजह्रुः; तस्मान्नोप-यह पहले घटी हुई आख्यायिका ही यहाँ सूचित की गयी है। अष्टाध्यायीमें शाकल्यके साथ याज्ञवल्क्यका समानपर्यन्त ही संवाद हुआ है; फिर याज्ञवल्क्यने उसे शाप दिया है कि 'तू पुण्यक्षेत्रातिरिक्त देश और पुण्यतिथिशून्य कालमें मरेगा और तेरी हड्डियाँ भी घरतक नहीं पहुँचेंगी।' वह इसी प्रकार मरा। यहाँतक कि अन्य वस्तु समझकर उसकी हड्डियोंको लुटेरे ले गये; इसलिये उपवादी (तिरस्कार करनेवाला) नहीं होना

१. यह बृहदारण्यकसे पूर्ववर्ती कर्मविषयक ग्रन्थ है।