बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 835, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८२३ |
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| वादी स्यादुत ह्येवंवित् परो भवतीति । सैषा आख्यायिका आचारार्थं सूचिता विद्यास्तुतये चेह ॥ २६ ॥ | चाहिए; क्योंकि ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ होता है। यह आख्यायिका यहाँ आचारप्रदर्शन और विद्याकी स्तुतिके लिये सूचित की गयी है ॥ २६ ॥ |
याज्ञवल्क्यका सभासदोंको प्रश्न करनेके लिये आमन्त्रण
| यस्य नेति नेतीत्यन्यप्रतिषेधद्वारेण ब्रह्मणो निर्देशः कृतः, तस्य विधिमुखेन कथं निर्देशः कर्तव्यः, इति पुनराख्यायिकामेव आश्रित्याह मूलं च जगतो वक्तव्यमिति । आख्यायिकासम्बन्धस्त्वब्रह्मविदो ब्राह्मणाञ्जित्वा गोधनं हर्तव्यमिति । न्यायं मत्वाऽह— | जिस ब्रह्मका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार अन्य पदार्थोंके प्रतिषेधद्वारा निर्देश किया गया है, उसका विधिमुखसे किस प्रकार निर्देश करना चाहिये, अतः इस उद्देश्यसे कि जगत्का मूल बतलाना है, श्रुति पुनः आख्यायिकाका ही आश्रय लेकर कहती है। आख्यायिकाका सम्बन्ध तो यही है कि अब्रह्मज्ञ ब्राह्मणोंको जीतकर गोधन ले जाना उचित है। अतः न्याय समझकर याज्ञवल्क्यजी कहते हैं— |
अथ होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वः कामयते स मा पृच्छतु सर्वे वा मा पृच्छत यो वः कामयते तं वः पृच्छामि सर्वान् वा वः पृच्छामीति ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः ॥ २७ ॥
फिर याज्ञवल्क्यने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमेंसे जिसकी इच्छा हो वह मुझसे प्रश्न करे, अथवा आप सभी मुझसे प्रश्न करें, इसी प्रकार आपमेंसे जिसकी इच्छा हो, उससे मैं प्रश्न करता हूँ या आप सभीसे मैं प्रश्न करता हूँ।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ ॥ २७ ॥