भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 837
ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ८२५

| तेषु अप्रगल्भभूतेषु ब्राह्मणेषु तान् हतैर्वक्ष्यमाणैः श्लोकैः पप्रच्छ पृष्टवान्। यथा लोके वृक्षो वनस्पतिः, वृक्षस्य विशेषणं वनस्पतिरिति, तथैव पुरुषोऽमृषा—अमृषा सत्यमेतत्—तस्य लोमानि; तस्य पुरुषस्य लोमानीतरस्य वनस्पतेः पर्णानि; त्वगस्योत्पाटिका बहिः—त्वगस्य पुरुषस्य इतरस्योत्पाटिका वनस्पतेः ॥ १ ॥ | जब वे ब्राह्मण कुछ बोलनेका साहस न कर सके तो याज्ञवल्क्यने उनसे इन आगे कहे जानेवाले श्लोकोंद्वारा पूछा। जिस प्रकार लोकमें वनस्पति अर्थात् विशालता आदि गुणोंसे युक्त वृक्ष है—वनस्पति यह वृक्षका विशेषण है—उसी प्रकार यानी उस वृक्षके समान धर्मोंसे सम्पन्न पुरुष भी है—यह बिल्कुल सत्य बात है। उसके लोम—उस पुरुषके लोम हैं और उन्हींके समान इतर यानी इस वनस्पतिके पत्ते होते हैं तथा 'त्वगस्योत्पाटिका बहिः' इस पुरुषके शरीरमें जो त्वचा है, उसकी समानता रखनेवाली इतर यानी इस वनस्पति वृक्षके बाहरी भागमें छाल है ॥ १ ॥ |


त्वच एवास्य रुधिरं प्रस्यन्दि त्वच उत्पटः ।
तस्मात्तदातृण्णात् प्रैति रसो वृक्षादिवाहतात् ॥२॥

इस पुरुषकी त्वचासे ही रक्त चूता है और वृक्षकी भी त्वचा (छाल) से ही गोंद निकलता है। वृक्ष और पुरुषकी इस समानताके कारण ही जिस प्रकार आघात लगनेपर वृक्षसे रस निकलता है, उसी प्रकार चोट खाये हुए पुरुष-शरीरसे रक्त प्रवाहित होता है ॥ २ ॥

त्वच एव सकाशादस्य पुरुषस्य रुधिरं प्रस्यन्दि, वनस्पतेस्त्वचइस पुरुषकी त्वचाके ही पाससे रक्त चूकर गिरता हे और वनस्पतिकी