भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 838, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 838
८२६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| उत्पटः—त्वच एवोत्स्फुटति यस्मात्; एवं सर्वं समानमेव वनस्पतेः पुरुषस्य च; तस्माद् आत्ण्णात् हिंसितात् प्रति तद् रुधिरं निर्गच्छति वृक्षादिव आहताच्छिन्नाद् रसः ॥ २ ॥ | भी त्वचा (छाल) से ही उत्पट अर्थात् गोंद निकलता है; क्योंकि वह (गोंद) वृक्षकी छालसे ही फूटकर बहता है। इस प्रकार वनस्पति और पुरुषकी सभी बातें एक-ही-जैसी हैं। इसीलिये आहत अर्थात् कटे हुए वृक्षसे निकले हुए रसकी भाँति चोट खाये हुए पुरुष-शरीरसे भी वह रुधिर निकलता है ॥ २ ॥ |


मांसान्यस्य शकराणि किनाटँ स्नाव तत् स्थिरम् ।

अस्थीन्यन्तरतो दारूणि मज्जा मज्जोपमा कृता ॥ ३॥

पुरुषके शरीरमें मांस होते हैं और वनस्पतिके शकर (छालका भीतरी अंश), पुरुषके स्नायु—जाल होते हैं और वृक्षमें किनाट (शकरके भी भीतरका अंश-विशेष)। वह किनाट स्नायुकी ही भाँति स्थिर होता है। पुरुषके स्नायु-जालके भीतर जैसे हड्डियां होती हैं, वैसे ही वृक्षमें किनाटके भीतर काष्ठ हैं तथा मज्जा तो दोनोंमें मज्जाके ही समान निश्चित की गयी है ॥ ३ ॥

| एवं मांसान्यस्य पुरुषस्य, वनस्पतेस्तानि शकराणि शकलानीत्यर्थः । किनाटं वृक्षस्य, किनाटं नाम शकलेभ्योऽभ्यन्तरं वल्कलरूपं काष्ठसंलग्नम्, तत् स्नाव पुरुषस्य; तत् स्थिरम्—तच्च किनाटं स्नाववद् | इसी प्रकार इस पुरुषके मांस हैं और वनस्पतिके मांसस्थानीय शकर—शकल (छालके भीतरका अंश) हैं। वृक्षके किनाट होता है, किनाट उसे कहते हैं जो शकलोंसे भीतर काठसे लगी हुई छाल होती है, वह [अर्थात् उसके सदृश] पुरुषकी शिराएँ हैं। वह स्थिर है अर्थात् वह किनाट शिराओंके समान दृढ़ है। पुरुषकी |