भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 839, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 839

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७


| दृढं हि तत्; अस्थीनि पुरुषस्य, स्नाव्नो ऽन्तरतोऽस्थीनि भवन्ति; तथा किनाटस्याभ्यन्तरतो दारूणि काष्ठानि; मज्जा, मज्जैव वनस्पतेः पुरुषस्य च मज्जोपमा कृता, मज्जाया उपमा मज्जोपमा, नान्यो विशेषोऽस्तीत्यर्थः; यथा वनस्पतेर्मज्जा तथा पुरुषस्य, यथा पुरुषस्य तथा वनस्पतेः॥३॥ | शिराओंके भीतर अस्थियां होती हैं; इसी प्रकार किनाटके भीतर काष्ठ होता है; मज्जा-वनस्पति तथा पुरुषकी मज्जा ही मज्जाकी उपमा नियत की गयी है, मज्जाकी उपमा ही मज्जोपमा है, अर्थात् उनमें कोई अन्य भेद नहीं है; जिस प्रकार वनस्पतिकी मज्जा होती है, वैसे ही पुरुषकी होती है और जैसे पुरुषकी होती है वैसे ही वनस्पतिको होती है ॥ ३ ॥ |


यद् वृक्षो वृक्णो रोहति मूलान्नवतरः पुनः ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥४॥

किंतु यदि वृक्षको काट दिया जाता है तो अपने मूलसे पुनः और भी नवीन होकर अङ्कुरित हो जाता है; इसी प्रकार यदि मनुष्यको मृत्यु काट डाले तो वह किस मूलसे उत्पन्न होगा ? ॥ ४ ॥

| यद् यदि वृक्षो वृक्णश्छिन्नो रोहति पुनः पुनः प्ररोहति प्रादुर्भवति मूलात् पुनर्नवतरः पूर्वस्मादभिनवतरः; यदेतस्माद् विशेषात् प्राग् वनस्पतेः पुरुषस्य च, सर्वं सामान्यमवगतम्; अयं तु वनस्पतौ विशेषो दृश्यते यच्छिन्नस्य प्ररोह- | यदि वृक्षको काट दिया जाय तो वह पुनः-पुनः अपनी जड़से अतिशय नवीन—पहलेकी अपेक्षा नवीनतर होकर अङ्कुरित-प्रादुर्भूत हो जाता है। इस विशेषणसे पूर्व वनस्पति और पुरुषकी सब प्रकार समानता जानी गयी है; किंतु कट जानेपर पुनः अङ्कुरित हो जाना यह वनस्पतिमें विशेषता देखी जाती है; परंतु |