बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 840, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| णम्; न तु पुरुषे मृत्युना वृक्णे पुनः प्ररोहणं दृश्यते; भवितव्यं च कुतश्चित्प्ररोहणेन; तस्माद् वः पृच्छामि—मर्त्यो मनुष्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ? मृतस्य पुरुषस्य कुतः प्ररोहणमित्यर्थः ॥ ४ ॥ | मृत्युद्वारा छेदन किये जानेपर पुरुषको पुनः अङ्कुरित होते नहीं देखा जाता; किंतु वह किसीसे अङ्कुरित अवश्य होना चाहिये; इसीसे मैं आपलोगोंसे पूछता हूँ कि यदि मृत्युद्वारा मनुष्यका छेदन कर दिया जाय तो वह किस मूलसे अङ्कुरित होता है ? अर्थात् मरे हुए पुरुषकी उत्पत्ति कहांसे होती है ? ॥ ४ ॥ |
रेतस इति मा वोचत जीवतस्तत् प्रजायते ।
धानारुह इव वै वृक्षोऽञ्जसा प्रेत्य सम्भवः ॥५॥
वह वीर्यसे उत्पन्न होता है—ऐसा तो मत कहो, क्योंकि वीर्य तो जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है [ मृत पुरुषसे नहीं ] । वृक्ष भी [केवल तनेसे ही नहीं उत्पन्न होता, ] बीजसे भी उत्पन्न होता है, किंतु बीजसे उत्पन्न होनेवाला वृक्ष भी कट जानेके पश्चात् पुनः अङ्कुरित होकर उत्पन्न होता है, यह प्रत्यक्ष देखा गया है ॥ ५ ॥
| यदि चेदेवं वदथ—रेतसः प्ररोहतीति, मा वोचत मैवं वक्तुमर्हथ; कस्मात् ? यस्माज्जीवतः पुरुषात्तद् रेतः प्रजायते, न मृतात् । अपि च धानारुहः, धाना बीजम्, बीजरुहोऽपि वृक्षो भवति, न केवलं काण्डरुह एव; इवशब्दोऽनर्थकः; | यदि तुम ऐसा कहो कि वह वीर्यसे उत्पन्न होता है, तो मत कहो—ऐसा कहना उचित नहीं है; क्यों नहीं है ? क्योंकि वीर्य जीवित पुरुषसे ही उत्पन्न होता है, मरे हुएसे नहीं होता । वृक्ष धानारुह भी है, धाना बीजको कहते हैं, उस बीजसे उत्पन्न होनेवाला भी वृक्ष होता है; वह केवल तनेसे ही उत्पन्न नहीं होता; 'इव' शब्द- |