बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 841, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८२९
| वै वृक्षोऽञ्जसा साक्षात् प्रेत्य<br>मृत्वा सम्भवो धानातोऽपि प्रेत्य<br>सम्भवो भवेदञ्जसा पुनर्वन-<br>स्पतेः ॥ ५ ॥ | का कोई अर्थ नहीं है; यह प्रसिद्ध<br>है कि वृक्ष मरकर भी पुनः साक्षात्<br>उत्पन्न हो जाता है; धाना अर्थात्<br>बीजसे उत्पन्न हुए वनस्पतिका भी<br>कटनेके बाद पुनः प्रादुर्भाव हो<br>जाता है [ किंतु जीवके शरीरका<br>इस प्रकार आविर्भाव नहीं देखा<br>जाता ] ॥ ५ ॥ |
यत् समूलमावृहेयुर्वृक्षं न पुनराभवेत् ।
मर्त्यः स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मूलात् प्ररोहति ॥ ६ ॥
यदि वृक्षको मूलसहित उखाड़ दिया जाय तो वह फिर उत्पन्न नहीं होगा; इसी प्रकार यदि मनुष्यका मृत्यु छेदन कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न होता है ? ॥ ६ ॥
| यद् यदि सह मूलेन धानया<br>वा आवृहेयुरुद्यच्छेयुरुत्पाटयेयु-<br>र्वृक्षम्, न पुनराभवेत् पुनरागत्य<br>न भवेत् । तस्माद् वः पृच्छामि<br>सर्वस्यैव जगतो मूलम्—मर्त्यः<br>स्विन्मृत्युना वृक्णः कस्मान्मू-<br>लात् प्ररोहति ॥ ६ ॥ | यदि वृक्षको मूल अथवा बीजके<br>सहित 'आवृहेयुः'—आकर्षित कर<br>लें-उखाड़ लें तो फिर वह वृक्ष<br>कहींसे आकर उत्पन्न नहीं होगा ।<br>इसलिये मैं तुमलोगोंसे सम्पूर्ण<br>जगत्के मूलके सम्बन्धमें प्रश्न कर<br>रहा हूँ—यदि मृत्यु मनुष्यका छेदन<br>कर दे तो वह किस मूलसे उत्पन्न<br>होता है ? ॥ ६ ॥ |
जात एव न जायते को न्वेनं जनयेत् पुनः ।
विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातिर्दातुः परायणं तिष्ठमानस्य
तद्विद इति ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥