बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 842, कुल 1402 में से
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| ८३० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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[ यदि ऐसा मानो कि ] पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, अतः फिर उत्पन्न नहीं होता [ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि वह मरकर पुनः उत्पन्न होता ही है ] ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? [ यह प्रश्न है; ब्राह्मणोंने इसका कोई उत्तर नहीं दिया, इसलिये श्रुति स्वयं ही उसका निर्देश करती है—] विज्ञान आनन्द ब्रह्म है, वह धनदाता (कर्म करनेवाले यजमान ) की परम गति है और ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मवेत्ताका भी परम आश्रय है ॥ ७ ॥ ॥ २८ ॥
| जात एवेति मन्यध्वं यदि किमत्र प्रष्टव्यमिति—अनिष्यमाणस्य हि सम्भवः प्रष्टव्यः, न जातस्य, अयं तु जात एवातोऽस्मिन् विषये प्रश्न एव नोपपद्यत इति चेत्—न, किं तर्हि ? मृतः पुनरपि जायत एवान्यथाकृताभ्यागमकृतनाशप्रसङ्गात्; अतो वः पृच्छामि—को न्वेनं मृतं पुनर्जनयेत् ? | यदि तुम ऐसा मानते हो कि पुरुष तो उत्पन्न हो ही गया है, उसके विषयमें क्या पूछना—क्योंकि जो उत्पन्न होनेवाला होता है, उसीकी उत्पत्तिके विषयमें पूछा जाता है, जो उत्पन्न हो चुका है, उसके विषयमें नहीं पूछा जाता; वह पुरुष तो उत्पन्न हो चुका है, इसलिये इसके विषयमें प्रश्न करना उचित नहीं है, तो ऐसा कहना ठीक नहीं; तो क्या बात है ? मरनेपर भी तो यह पुनः उत्पन्न होता ही है, नहीं तो बिना कियेकी प्राप्ति और किये हुएके नाशका प्रसङ्ग आ जायगा; इसीसे मैं तुमलोगोंसे पूछता हूँ कि मरनेपर इसे पुनः कौन उत्पन्न करेगा ? |
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| तन्न बिजज्ञुब्रह्मणाः—यतो मृतः पुनः प्ररोहति जगतो मूलं न विज्ञातं ब्राह्मणैः; अतो ब्रह्मिष्ठत्वादू हृता गावः; याज्ञवल्क्येन | ब्राह्मणोंको इसका विशेष ज्ञान नहीं था, जहाँसे मरनेपर पुरुष पुनः जन्म लेता है; उस जगत्के मूलका ब्राह्मणोंको पता नहीं था। अतः ब्रह्मिष्ठ होनेके कारण याज्ञवल्क्यने गायोंको हरण कर लिया और वे |