बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 843, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 843
| ब्राह्मण ९ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८३१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| जिता ब्राह्मणाः । समाप्ता आख्यायिका । | ब्राह्मण जीत लिये गये । आख्यायिका समाप्त हुई । |
| यज्जगतो मूलम्, येन च शब्देन साक्षाद् व्यपदिश्यते ब्रह्म, यद् याज्ञवल्क्यो ब्राह्मणान् पृष्टवांस्तत् स्वेन रूपेण श्रुतिरस्मभ्यमाह—विज्ञानं विज्ञप्तिविज्ञानम्, तच्च आनन्दम्, न विषयविज्ञानवद् दुःखानुविद्धम्, किं तर्हि ? प्रसन्नं शिवमतुलमानायासं नित्यतृप्तमेकरसमित्यर्थः, किं तद् ब्रह्म उभयविशेषणवद् रातिः—रातेः षष्ठ्यर्थे प्रथमा, धनस्येत्यर्थः, धनस्य दातुः कर्मकृतो यजमानस्य परायणं परा गतिः कर्मफलस्य प्रदातृ । | जो जगत्का मूल है, जिस शब्दसे ब्रह्मका साक्षात् निर्देश किया जाता है और जिसके विषयमें याज्ञवल्क्यने ब्राह्मणोंसे पूछा था, उसे श्रुति हमारे लिये स्वयं ही बतलाती है—विज्ञान—विज्ञप्तिका नाम विज्ञान है, वही आनन्द भी है, विषयविज्ञानके समान वह दुःखसे अनुविद्ध नहीं है, तो फिर कैसा है ? प्रसन्न, शिव, अतुल, अनायास नित्यतृप्त और एकरस है—ऐसा इसका तात्पर्य है । जो [विज्ञान और आनन्द इन] दोनों विशेषणोंसे युक्त है वह ब्रह्म क्या है ? रातिः—रातेः (रातिका) अर्थात् धनका इस प्रकार 'रातिः' शब्दमें षष्ठीके अर्थमें प्रथमा विभक्ति है, तात्पर्य यह कि धन देनेवाले अर्थात् कर्म करनेवाले यजमानका परायण—परा गति अर्थात् कर्मफल प्रदान करनेवाला है । |
| किञ्च व्युत्थायैषणाभ्यस्तस्मिन्नेव ब्रह्मणि तिष्ठत्यकर्मकृत्, तद् ब्रह्म वेत्तीति तद्विच्च; तस्य—तिष्ठमानस्य च तद्विदः; ब्रह्मविद इत्यर्थः, परायणमिति । | इसी प्रकार जो एषणाओंसे अलग होकर उस ब्रह्ममें ही परिनिष्ठित है, कर्मकर्ता नहीं है, और उस ब्रह्मको जानता है, इसलिये तद्वित् (ब्रह्मविद्) है, उस ब्रह्मनिष्ठ और तद्विद् यानी ब्रह्मवेत्ताका भी परायण है । |