भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 844, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 844
८३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अत्रे॒दं विचार्यते—आनन्दशब्दो लोके सुखवाची प्रसिद्धः; अत्र च ब्रह्मणो विशेषणत्वेन आनन्दशब्दः श्रूयते—आनन्दं ब्रह्मेति। श्रुत्यन्तरे च—“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्” (तै० ३।६।१) “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” (तै० ३।२।४।१) “यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्” (तै० उ० २।८।१।) “यो वै भूमा तत् सुखम्” (छा० उ० ७।२३।१) इति च; “एष परम आनन्दः” (बृ० उ० ४।३।३३) इत्येवमाद्याः। संवेद्ये च सुखे आनन्दशब्दः प्रसिद्धः; ब्रह्मानन्दश्च यदि संवेद्यः स्याद् युक्ता एते ब्रह्मण्यानन्दशब्दाः।<br><br>(पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मानन्दस्य वेद्यत्वावेद्यत्वं मीमांस्यते)<br><br>ननु च श्रुतिप्रामाण्यात् संवेद्यानन्दस्वरूपमेव ब्रह्म, किं तत्र विचार्यम् ?<br><br>इति न, विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात्—सत्यम्, आनन्दशब्दो ब्रह्मणि श्रूयते; | यहाँ यह विचार किया जाता है—लोकमें 'आनन्द' शब्द सुखवाची प्रसिद्ध है; और यहाँ 'आनन्दं ब्रह्म' इस प्रकार 'आनन्द' शब्द ब्रह्मके विशेषणरूपमें श्रुत है; अन्य श्रुतियोंमें भी यह ब्रह्मके विशेषणरूपसे श्रुत हुआ है; जैसे—"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्"¹ "आनन्दं² ब्रह्मणो विद्वान्" "यदेष³ आकाश आनन्दो न स्यात्" "यो⁴ वै भूमा तत् सुखम्" इत्यादि तथा ऐसी ही "एष⁵ परम आनन्दः" इत्यादि श्रुतियाँ हैं। किंतु 'आनन्द' शब्द संवेद्य (ज्ञेय) सुखके अर्थमें ही प्रसिद्ध है; अतः यदि ब्रह्मानन्द भी संवेद्य (ज्ञेय) हो तभी ब्रह्ममें ये 'आनन्द' शब्द सार्थक हो सकते हैं।<br><br>पूर्व०—किंतु श्रुतिके प्रमाणसे ब्रह्म संवेद्य आनन्दस्वरूप तो है ही, फिर इसमें विचार क्या करना है ?<br><br>सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इस विषयमें विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं—यह तो ठीक है कि ब्रह्ममें 'आनन्द' शब्द श्रुत होता है; |


१. आनन्द ब्रह्म है—ऐसा जाना।
२. ब्रह्मके आनन्दको जाननेवाला।
३. यदि यह आकाश आनन्द न होता।
४. जो भी भूमा है, वही सुख है।
५. यह परम आनन्द है।