बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 845, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३३
| विज्ञानप्रतिषेधश्चैकत्वे—"यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं विजानीयात्" (बृ० उ० ४।५।१५) "यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा" (छा० उ० ७।२४।१) "प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद" (बृ० उ० ४।३।२१) इत्यादि; विरुद्धश्रुतिवाक्यदर्शनात् तेन कर्तव्यो विचारः; तस्माद् युक्तं वेदवाक्यार्थनिर्णयाय विचारयितुम् । | किंतु साथ ही एक होनेके कारण उसके विज्ञानका प्रतिषेध भी श्रुत होता है। जैसे—"जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, उस अवस्थामें किसके द्वारा किसको देखे और किसके द्वारा किसको जाने?" "जहाँ अन्य कुछ नहीं देखता, अन्य कुछ नहीं सुनता और अन्य कुछ नहीं जानता वह भूमा है" "प्रज्ञानात्मासे आलिङ्गित (अभिन्न) होकर यह बाह्य कुछ भी नहीं जानता" इत्यादि। इस प्रकार उससे विरुद्ध श्रुतिवाक्य देखे जाते हैं, इसलिये विचार करना आवश्यक है; अतः वेदके वचनोंका तात्पर्य निर्णय करनेके लिये विचार करना उचित ही है। | | मोक्षवादिविप्रतिपत्तेश्च—सांख्या वैशेषिकाश्च मोक्षवादिनो नास्ति मोक्षे सुखं संवेद्यमित्येवं विप्रतिपन्नाः; अन्ये निरतिशयं सुखं स्वसंवेद्यमिति; किं तावद् युक्तम् ? | इसके सिवा मोक्षवादियोंमें मतभेद होनेके कारण भी विचार करना आवश्यक है—सांख्य और वैशेषिक मोक्षवादियोंका ऐसा विपरीत विचार है कि मोक्षमें संवेद्य सुख है ही नहीं, किंतु दूसरे मोक्षवादियोंका मत है कि मोक्षमें निरतिशय स्वसंवेद्य सुख है; सो इनमें कौन-सी बात ठीक है? | | आनन्दादिश्रवणात् "जक्षत् क्रीडन् रममाणः" (छा० उ० ८।१२।३) "स यदि पितृलोककामो भवति" (छा० उ० ८।२।१) | पूर्व०—आनन्दादिका श्रवण होनेसे तथा "भक्षण करता हुआ, क्रीडा करता हुआ, रमण करता हुआ" "वह यदि पितृलोककी इच्छावाला |
बृ० उ० ५३—