भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 846, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 846
८३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
संस्कृत मूल / भाष्यहिन्दी अनुवाद
"यः सर्वज्ञः सर्ववित्" (मुण्डक० १ । १ । ९) "सर्वान् कामान् समश्नुते" (तै० उ० २ । ५ । १) इत्यादिश्रुतिभ्यो मोक्षे सुखं संवेद्यमिति ।होता है" "जो सर्वज्ञ और सर्ववेत्ता है" "समस्त कामोंको प्राप्त करता है" इत्यादि श्रुतियोंसे तो मोक्षमें संवेद्य सुख जान पड़ता है।
नन्वेकत्वे कारकविभागाभावाद् विज्ञानानुपपत्तिः, क्रियायाश्चानेककारकसाध्यत्वाद् विज्ञानस्य च क्रियात्वात् ।सिद्धान्ती—किंतु उस समय एकत्व होनेके कारण कारकविभागका अभाव होनेसे विज्ञान होना सम्भव नहीं है, क्योंकि क्रिया अनेक कारकद्वारा साध्य होती है और विज्ञान भी एक क्रिया ही है।
नैष दोषः; शब्दप्रामाण्याद् भवेद् विज्ञानमानन्दविषये; "विज्ञानमानन्दम्" इत्यादीनि आनन्दस्वरूपस्यासंवेद्यत्वेऽनुपपन्नानि वचनानीत्यवोचाम ।पूर्व०—यह दोष नहीं हो सकता; शब्दप्रामाण्य होनेके कारण उस समय आनन्दविषयक विज्ञान रहना ही चाहिये; यदि आनन्दस्वरूप असंवेद्य होगा तो "विज्ञानमानन्दं ब्रह्म" इत्यादि वाक्य अनुपपन्न हो जायँगे—ऐसा हम पहले कह चुके हैं।
ननु वचनेनाप्यग्नेः शैत्यमुदकस्य चौष्ण्यं न क्रियते एव, ज्ञापकत्वाद् वचनानाम्। न च देशान्तरेऽग्निः शीत इति शक्यते ज्ञापयितुम्; अगम्ये वा देशान्तरे उष्णमुदकमिति ।सिद्धान्ती—किंतु वचनके द्वारा भी अग्निकी शीतलता और जलकी उष्णता नहीं की जा सकती, क्योंकि वचन तो ज्ञापक ही हैं और यह बात बतलायी नहीं जा सकती कि किसी देशान्तरमें अग्नि शीतल है और किसी अगम्य देशान्तरमें जल उष्ण है।
न, प्रत्यगात्मन्यानन्दविज्ञानदर्शनात्; न 'विज्ञानमानन्दम्' इत्येवमादीनां वचनानां शीतो-पूर्व०- ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रत्यगात्मामें तो आनन्दका विज्ञान देखा जाता है। 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि वाक्य 'अग्नि शीत है'-