भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 847, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 847
ब्राह्मण ९ ]शाङ्करभाष्यार्थ८३५
संस्कृत मूलहिन्दी भाष्यार्थ
ऽग्निरित्यादिवाक्यवत् प्रत्यक्षादिविरुद्धार्थप्रतिपादकत्वम् । अनुभूयते त्वविरुद्धार्थता; सुख्यहमिति सुखात्मकमात्मानं स्वयमेव वेदयते; तस्मात् सुतरां प्रत्यक्षाविरुद्धार्थता; तस्मादानन्दं ब्रह्म विज्ञानात्मकं सत् स्वयमेव वेदयते । तथा आनन्दप्रतिपादिकाः श्रुतयः समजसाः स्युः 'जक्षत् क्रीडन् रममाणः' इत्येवमाद्याः पूर्वोक्ताः ।इत्यादि वाक्योंके समान प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करनेवाले नहीं हैं । इनकी अविरुद्धार्थताका तो अनुभव होता है । 'मैं सुखी हूँ' इस प्रकार सुखस्वरूप आत्माको पुरुष स्वयं ही जानता है, इसलिये इनकी अविरुद्धता तो अत्यन्त प्रत्यक्ष ही है । अतः आनन्द ब्रह्म विज्ञानात्मक होते हुए स्वयं ही जानता है । इसी प्रकार पहले कही हुई 'जक्षत् क्रीडन् रममाणः' इत्यादि आनन्दका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियां सुसंगत हो सकती हैं ।
न, कार्यकारणाभावेऽनुपपत्तेर्विज्ञानस्य — शरीरवियोगो हि मोक्ष आत्यन्तिकः; शरीराभावे च करणानुपपत्तिः, आश्रयाभावात्; ततश्च विज्ञानानुपपत्तिः, अकार्यकरणत्वात्; देहाद्यभावे च विज्ञानोत्पत्तौ सर्वेषां कार्यकारणोपादानानर्थक्यप्रसङ्गः ।सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि देह और इन्द्रियोंका अभाव होनेपर विज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हो सकती—शरीरका वियोग हो जाना ही आत्यन्तिक मोक्ष है और शरीर न रहनेपर आश्रयका अभाव हो जानेके कारण इन्द्रियोंका रहना भी असम्भव है; अतः देह और इन्द्रियोंका अभाव हो जानेसे उस समय विज्ञान नहीं हो सकता; यदि देहादिके अभावमें भी विज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय तो समस्त जीवोंके देह और इन्द्रियोंको ग्रहण करनेकी व्यर्थताका प्रसङ्ग उपस्थित होगा ।