बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 848, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 848
| ८३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| **एकत्वविरोधाच्च—**परं चेद् ब्रह्म आनन्दात्मकमात्मानं नित्यविज्ञानत्वान्नित्यमेव विजानीयात्, तन्न, संसार्थपि संसारविनिर्मुक्तः स्वाभाव्यं प्रतिपद्येत; जलाशय इवोदकाञ्जलिः क्षिप्तो न पृथक्त्वेन व्यवतिष्ठते आनन्दात्मकब्रह्मविज्ञानाय, तदा मुक्त आनन्दात्मकमात्मानं वेदयते इत्येतदनर्थकं वाक्यम्। | इसके सिवा एकत्वसे विरोध होनेके कारण भी विज्ञान होना अनुपपन्न है—यदि ऐसा मानो कि नित्यविज्ञानानन्दस्वरूप होनेके कारण परब्रह्म अपने आनन्दमय स्वरूपको नित्य ही जानता रहता है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि संसारी जीव भी संसारसे मुक्त होनेपर ब्रह्मस्वरूपताको प्राप्त हो जाता है, जलाशयमें डाली हुई जलकी अञ्जलिके समान वह भी आनन्दस्वरूप ब्रह्मके विज्ञानके लिये पृथक् होकर स्थित नहीं हो सकता; ऐसी स्थितिमें यह कहना कि मुक्त पुरुष आनन्दस्वरूप आत्माको जानता है, निरर्थक ही है। |
| अथ ब्रह्मानन्दमन्यःसन् मुक्तो वेदयते, प्रत्यगात्मानं च, अहमस्म्यानन्दस्वरूप इति, तदैकत्वविरोधः, तथा च सति सर्वश्रुतिविरोधः, तृतीया च कल्पना नोपपद्यते। | और यदि ऐसा कहो कि मुक्त पुरुष ब्रह्मसे अलग रहकर ब्रह्मानन्दको और 'मैं आनन्दस्वरूप हूँ' इस प्रकार प्रत्यगात्माको जानता है तो ऐसी स्थितिमें एकत्वसे विरोध आता है; और ऐसा होनेपर सभी श्रुतियोंसे विरोध होता है। इन दो पक्षोंके¹ सिवा कोई तीसरी कल्पना होनी सम्भव नहीं है। |
| किञ्चान्यत्, ब्रह्मणश्च निरन्तरात्मानन्दविज्ञाने विज्ञानाविज्ञान- | एक बात और भी है, ब्रह्मको आत्मानन्दका निरन्तर विज्ञान माननेपर उसके विज्ञान और अविज्ञानकी |
¹ १. मुक्त पुरुषको ब्रह्मसे अभिन्न या भिन्न माननेके सिवा।