भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 849, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 849

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८३७


| कल्पनानर्थक्यम्; निरन्तरं चेदात्मानन्दविषयं ब्रह्मणो विज्ञानम्, तदेव तस्य स्वभाव इत्यात्मानन्दं विजानातीति कल्पनानुपपन्ना; अतद्विज्ञानप्रसङ्गे हि कल्पनाया अर्थवत्त्वम्, यथा आत्मानं परं च वेत्तीति, न हीष्वाद्यासक्तमनसो नैरन्तर्येणेषुज्ञानाज्ञानकल्पनाया अर्थवत्त्वम् ।<br><br>अथ विच्छिन्नमात्मानन्दं विजानाति—विज्ञानस्य आत्मविज्ञानच्छिद्रे अन्यविषयत्वप्रसङ्गः; आत्मनश्च विक्रियावत्त्वं ततश्चानित्यत्वप्रसङ्गः; तस्माद् विज्ञानमानन्दमिति स्वरूपान्वाख्यानपरैव श्रुतिः, नात्मानन्दसंवेद्यत्वार्था ।<br><br>'जक्षत् क्रीडन्' इत्यादिश्रुति- | कल्पना भी व्यर्थ हो जाती है; यदि ब्रह्मको आत्मानन्दविषयक विज्ञान निरन्तर रहता है, तो वही उसका स्वभाव समझना चाहिये; अतः वह आत्मानन्दको जानता है—यह कल्पना नहीं बन सकती । इस कल्पनाकी सार्थकता तो उसका विज्ञान न होनेका प्रसङ्ग होनेपर ही हो सकती है; जैसे—वह अपनेको और दूसरेको जानता है; जिसका चित्त निरन्तर बाणमें लगा हुआ है, उसके विषयमें बाणके ज्ञान और अज्ञानकी कल्पना सार्थक नहीं हो सकती ।<br><br>और यदि वह विच्छिन्नरूपसे ही आत्मानन्दको जानता है तो आत्मविज्ञानके छिद्रमें अर्थात् जिस समय आत्मानन्दका ज्ञान नहीं रहता, उस क्षणमें किसी अन्य विषयके विज्ञानके रहनेका प्रसङ्ग होगा; इससे आत्मा विकारी सिद्ध होगा और ऐसा होनेसे उसके अनित्य होनेका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; अतः 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' यह श्रुति ब्रह्मके स्वरूपका निर्देश करनेवाली ही है, आत्मानन्दका संवेद्यत्व बतलानेवाली नहीं है ।<br><br>पूर्व०—किंतु आत्मानन्दका |