बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 850, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८३८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| विरोधोऽसंवेद्यत्व इति चेत् ! | असंवेद्यत्व माननेपर 'जक्षत् क्रीडन्' इत्यादि श्रुतिसे विरोध होगा। | | न; सर्वात्मैकत्वे यथाप्राप्तानुवादित्वात्—मुक्तस्य सर्वात्मभावे सति यत्र क्वचिद् योगिषु देवेषु वा जक्षणादि प्राप्तम्, तद् यथाप्राप्तमेवानूद्यते—तत्तस्यैव सर्वात्मभावादिति सर्वात्मभावमोक्षस्तुतये । | सिद्धान्ती—नहीं; क्योंकि यह सर्वात्मैकत्वकी अनुभूति होनेपर यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली है। मुक्त पुरुषको सर्वात्मैकत्वकी प्राप्ति हो जानेपर जहाँ-कहीं योगियों अथवा देवताओंमें भक्षणादिकी प्राप्ति होती है, उस यथाप्राप्त भक्षणादिका ही इसके द्वारा अनुवाद किया गया है। अर्थात् सर्वात्मभाव होनेके कारण वह भक्षणादि उस मुक्त पुरुषका ही है—इस प्रकार यह कथन मोक्षकी स्तुतिके लिये है। | | यथाप्राप्तानुवादित्वे दुःखित्वमपीति चेत्—योग्यादिषु यथाप्राप्तजक्षणादिवत् स्थावरादिषु यथाप्राप्तदुःखित्वमपीति चेत् ! | पूर्व०—यदि यह श्रुति यथाप्राप्त भक्षणादिका अनुवाद करनेवाली हे तब तो उसका दुःखी होना भी प्राप्त होगा—योगी आदिकोंमें यथाप्राप्त भक्षणादिकी प्राप्तिके समान उसे स्थावरादिमें यथाप्राप्त दुःखित्वकी भी प्राप्ति होगी—ऐसा कहें तो ? | | न, नामरूपकृतकार्यकरणोपाधिसम्पर्कजनितभ्रान्त्यध्यारोपितत्वात् सुखित्वदुःखित्वादिविशेष- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सुखित्व और दुःखित्व आदि विशेष धर्म नाम-रूपजनित देह और इन्द्रियरूप उपाधिके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित हैं—इस प्रकार इन सब शङ्काओंका पहले ही |