बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 863, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ८४९
| यदेव ते कश्चिदब्रवीत्, उदङ्को नामतः शुल्बस्यापत्यं शौल्बायनोऽब्रवीत्; प्राणो वै ब्रह्मेति, प्राणो वायुर्देवता—पूर्ववत्। प्राण एव आयतनमाकाशः प्रतिष्ठा; उपनिषत्—प्रियमित्येनदुपासीत ।<br><br>कथं पुनः प्रियत्वम् ? प्राणस्य वै हे सम्राट् कामाय प्राणस्यार्थायायाज्यं याजयति पतितादिकमपि; अप्रतिगृह्यस्याप्युग्रादेः प्रतिगृह्णात्यपि; तत्र तस्यां दिशि वधनिमित्तमाशङ्कम्—वधाशङ्केत्यर्थः, यां दिशमेति तस्कराद्याकीर्णां च तस्यां दिशि वधाशङ्का; तच्चतत् सर्वं प्राणस्य प्रियत्वे भवति, प्राणस्यैव सम्राट् कामाय । तस्मात् प्राणो वै सम्राट् परमं ब्रह्म । नैनं प्राणो जहाति; समानमन्यत् ॥ ३ ॥ | 'यदेव ते कश्चिदब्रवीत्' इत्यादि मुझ़से उदङ्क नामवाले शौल्बायन—शुल्बके पुत्रने कहा है कि प्राण ही ब्रह्म है। पूर्ववत् 'प्राण' वायुदेवता है। प्राण ही आयतन है और आकाश प्रतिष्ठा है। इसकी 'प्रिय' इस रूपसे उपासना करे—यह उपनिषद् है।<br><br>'किंतु इसकी प्रियता किस प्रकार है?' 'हे सम्राट् ! प्राणकी ही कामनासे-प्राणके ही लिये अयाज्यसे पतितादिकसे भी यजन कराते हैं और प्रतिग्रहके अयोग्य उग्र (उद्दण्ड) आदिसे भी प्रतिग्रह लेते हैं तथा चोर और लुटेरों आदिसे आक्रान्त जिस दिशामें जाते हैं, उस दिशामें वधके कारण होनेवाली आशङ्का रखते हैं; उस दिशामें वधकी आशङ्का रहती है; यह सब प्राणकी प्रियता होनेपर ही होता है; हे सम्राट् ! प्राणके ही लिये यह सब होता है। अतः हे राजन् ! प्राण ही परम ब्रह्म है। [जो ऐसी उपासना करता है] उसे प्राण नहीं छोड़ता।' शेष पूर्ववत् है ॥ ३ ॥ |
वर्कुके बताये हुए चक्षुर्ब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे बर्क्कुर्वाष्णर्श्नक्षुर्वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा
बृ० उ० ५४—