बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 864, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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तद् वार्ष्णोऽब्रवीच्चक्षुर्वै ब्रह्मेत्यपश्यतो हि किँस्या-
दित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येक-
पाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य
चक्षुरेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा सत्यमित्येनदुपासीत
का सत्यता याज्ञवल्क्य चक्षुरेव सम्राडिति होवाच
चक्षुषा वै सम्राट् पश्यन्तमाहुरद्राक्षीरिति स आहाद्रा-
क्षमिति तत् सत्यं भवति चक्षुर्वै सम्राट् परमं ब्रह्म
नैनं चक्षुर्जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो
भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते। हस्त्यृषभँ
सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः स होवाच
याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥४॥
[ याज्ञवल्क्य– ] ‘तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।’ [ जनक– ] ‘मुझसे वृष्णके पुत्र बर्कुने कहा है कि चक्षु ही ब्रह्म है।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान् आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस वार्ष्णने ‘चक्षु ही ब्रह्म है’ ऐसा कहा है; क्योंकि न देखनेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं ?’ [ जनक– ] ‘मुझे नहीं बतलाये।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।’ [ जनक– ] ‘याज्ञवल्क्यजी ! वह हमें आप बतलाइये।’ [ याज्ञवल्क्य– ] ‘चक्षु ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है, इसकी ‘सत्य’ इस रूपसे उपासना करे।’ [ जनक– ] हे’ याज्ञवल्क्य ! सत्यता क्या है ?’ ‘हे राजन् ! चक्षु ही सत्यता है’ ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, ‘हे सम्राट् ! चक्षुसे देखनेवालेसे ही ‘क्या तूने देखा’ ऐसा जब कहा जाता है और वह कहता है कि ‘मैंने देखा’ तो वह सत्य होता है। राजन् ! चक्षु ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसका चक्षु त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और