बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 865, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५१
वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएँ देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको उपदेशके द्वारा कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ४ ॥
| यदेव ते कश्चिद् बर्कुशिति नामतो वृष्णस्यापत्यं वार्ष्णः; चक्षुर्वै ब्रह्मेति; आदित्यो देवता चक्षुषि। उपनिषत्—सत्यम्; यस्माच्छ्रोत्रेण श्रुतममृतमपि स्यात्, न तु चक्षुषा दृष्टम्; तस्माद् वै सम्राट् पश्यन्तमाहुः—अद्राक्षीस्त्वं हस्तिनमिति, स चेदद्राक्षमित्याह, तत् सत्यमेव भवति यस्त्वन्यो ब्रूयात्—अहमश्रौषमिति; तद् व्यभिचरति; यत्तु चक्षुषा दृष्टं तद्व्यभिचारित्वात् सत्यमेव भवति ॥ ४ ॥ | 'यदेव ते कश्चित्'—बर्कु इस नामवाले वार्ष्ण—वृष्णके पुत्रने 'चक्षु ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; चक्षुमें आदित्य देवता है। उसकी 'सत्य' यह उपनिषद् है, क्योंकि कानसे सुना हुआ तो मिथ्या भी हो सकता है, किंतु नेत्रसे देखा हुआ नहीं हो सकता; हे सम्राट् ! इसीसे देखनेवालेसे कहते हैं 'तुमने हाथी देखा ?' इसपर यदि वह कहे कि देखा है तो वह सत्य ही होता है। यदि कोई अन्य कहे कि मैंने सुना है तो उसमें तो अन्तर आ सकता है। किंतु जो नेत्रसे देखा हुआ होता है, उसमें अन्तर न आनेके कारण वह सत्य ही होता है ॥ ४ ॥ |
गर्दभीविपीतके कहे हुए श्रोत्रब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे गर्दभीविपीतो भारद्वाजः श्रोत्रं वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तद् भारद्वाजोऽब्रवीच्छ्रोत्रं वै ब्रह्मेत्यशृण्वतो किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्यायतनं प्रतिष्ठां