बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 866, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें८५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य श्रोत्रमेवायतनमाकाशः प्रतिष्ठा-नन्त इत्येनदुपासीत कानन्तता याज्ञवल्क्य दिश एव सम्राडिति होवाच तस्माद् वै सम्राडपि यां कां च दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छत्यनन्ता हि दिशो दिशो वै सम्राट् श्रोत्र ँ श्रोत्रं वै सम्राट् परमं ब्रह्म नैन ँ श्रोत्रं जहाति सर्वाण्येनं भूतान्यभिक्षरन्ति देवो भूत्वा देवानप्येति य एवं विद्वानेतदुपास्ते । हस्त्यृषभ ँ सहस्रं ददामीति होवाच जनको वैदेहः । स होवाच याज्ञवल्क्यः पिता मेऽमन्यत नाननुशिष्य हरेतेति ॥५॥
[ याज्ञवल्क्य-] 'तुमसे किसी आचार्यने जो भी कहा है, वह हम सुनें।' [ जनक-] 'मुझसे भारद्वाजगोत्रोत्पन्न गर्दभीविपीतने कहा है कि श्रोत्र ही ब्रह्म है।' [ याज्ञवल्क्य-] 'जिस प्रकार मातृमान्, पितृमान्, आचार्यवान् कहे, उसी प्रकार उस भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है; क्योंकि न सुननेवालेको क्या लाभ हो सकता है ? किंतु क्या उसने तुम्हें उसके आयतन और प्रतिष्ठा भी बतलाये हैं?' [ जनक ] 'मुझे नहीं बतलाये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'हे सम्राट् ! यह तो एक ही पादवाला ब्रह्म है।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह हमें आप बताइये।' [ याज्ञवल्क्य-] 'श्रोत्र ही आयतन है, आकाश प्रतिष्ठा है तथा इसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करे।' [ जनक-] 'हे याज्ञवल्क्य ! अन-न्तता क्या है ?' 'हे सम्राट् ! दिशाएँ ही अनन्तता हैं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इसीसे हे सम्राट् ! कोई भी जिस किसी दिशाको जाता है, वह उसका अन्त नहीं पाता; क्योंकि दिशाएँ अनन्त हैं' और हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं। श्रोत्र ही परम ब्रह्म है। जो विद्वान् इसकी इस प्रकार उपासना करता है, श्रोत्र उसका त्याग नहीं करता, सब भूत उसको उपहार देते हैं और वह देव होकर देवोंको प्राप्त होता है।' 'मैं आपको