बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 867, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५३
हाथीके समान हृष्ट-पुष्ट बैल उत्पन्न करनेवाली एक हजार गौएं देता हूँ' ऐसा विदेहराज जनकने कहा। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'मेरे पिताका विचार था कि शिष्यको कृतार्थ किये बिना उसका धन नहीं ले जाना चाहिये' ॥ ५ ॥
| 'यदेव ते' गर्दभीविपीत इति नामतः, भारद्वाजो गोत्रतः; श्रोत्रं वै ब्रह्मेति—श्रोत्रे दिग् देवता, अनन्त इत्येनदुपासीत; कानन्तता श्रोत्रस्य ? दिश एव श्रोत्रस्यानन्त्यं यस्मात्, तस्माद् वै सम्राट् प्राचीमुदीचीं वा यां काञ्चिदपि दिशं गच्छति नैवास्या अन्तं गच्छति कश्चिदपि; अतोऽनन्ता हि दिशः; दिशो वै सम्राट् श्रोत्रम्; तस्माद्दिगानन्त्यमेव श्रोत्रस्यानन्त्यम् ॥ ५ ॥ | 'यदेव ते'—गर्दभीविपीत ऐसे नामवाले गोत्रतः भारद्वाजने 'श्रोत्र ही ब्रह्म है' ऐसा कहा है। श्रोत्रमें दिग् देवता है, उसकी 'अनन्त' इस रूपसे उपासना करनी चाहिये। श्रोत्रकी अनन्तता क्या है? हे सम्राट् ! चूँकि दिशाएँ ही श्रोत्रकी अनन्तता हैं, इसलिये पूर्व या उत्तर जिस किसी भी दिशाको जाय, कोई उसका अन्त नहीं पाता; इसलिये दिशाएँ अनन्त हैं। हे सम्राट् ! दिशाएँ ही श्रोत्र हैं; अतः दिशाओंकी अनन्तता ही श्रोत्रकी अनन्तता है॥ ५॥ |
जाबालोक्त मनोब्रह्मकी उपासनाका फलसहित वर्णन
यदेव ते कश्चिदब्रवीत्तच्छृणवामेत्यब्रवीन्मे-सत्यकामो जाबालो मनो वै ब्रह्मेति यथा मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात्तथा तज्जाबालोऽब्रवीन्मनो वै ब्रह्मेत्यमनसो हि किँ स्यादित्यब्रवीत्तु ते तस्या-यतनं प्रतिष्ठां न मेऽब्रवीदित्येकपाद् वा एतत् सम्राडिति स वै नो ब्रूहि याज्ञवल्क्य मन एवा-यतनमाकाशः प्रतिष्ठानन्द इत्येनदुपासीत कानन्दता